Sunday, February 14, 2016

'विमुक्ता ' मूल तेलुगु संग्रह को इस साल के  केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है  . 


ओल्गा का कहानी-सन्ग्रह,'विमुक्ता' का मेरा अनुवाद लगभग दो साल पहले प्रकाशित हुआ था. मूल रचना का शीर्षक भी 'विमुक्ता 'है जिसकी कहानियां सीता से सम्बन्धित हैं.

Sunday, October 18, 2015






  
तेलुगु कहानी का अनुवाद











                                                                    रीच आउट                         तेलुगु मूल ः विजया  कर्रा
                                                                                                            अनुवाद ः आर.शांता सुंदरी


रेणू ने फिर एक बार सेल फोन में टाइम देखा.वह सिर्फ इसलिए परेशान नहीं थी कि बस के आने में देर हो गई,कुछ दूरी पर स्कूटर पर बैठे दो जवान लडके उसकी ओर देख देखकर और कुछ कहते हुए हंस रहे थे और बडी बेशर्मी से उसे ताक रहे थे.साथ खडे सज्जन यह सब अनदेखा करके  सामने की दीवार पर लगे फिल्मी पोस्टर देख रहे थे.बस स्टॉप के ठीक सामने लगे बडे बडे पोस्टरों में बहुत ही कम कपडे पहने करीना और कत्रीना खडी थीं.

जल्दी घर पहुंचकर भौतिकी का असाइनमेंट खत्म करना है, बस जल्दी आ जाए तो बेहतर होगा,रेणू  यह सोच ही रही थी कि दूर से एक बस आती दिखाई दी.दो कदम आगे चली तो पता चला वह उसकी बस नहीं है. पोस्टर देखनेवाले सज्जन उसमें चढ गए और बस चली गई.अब स्तॉप पर वह अकेली थी. बाइक पर बैठा एक लडका मुस्कुराते हुए उसके पास आकर खडा हो गया."और कितनी देर इंतजार करोगी,हमारे साथ बाइक  पर बैठो और हम तुम्हें घर छोड़ देंगे ..."रेणू ने अंदर की घबराहट जाहिर न होने दी और दूसरी ओर सिर घुमाकर देखने लगी जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं.पर मन में सोचने लगी कि अगर लडकों की हिम्मत और बढ गई और हालत खतरनाक हो गई तो क्या करना 
चाहिए.तय किया कि दस तक गिनूंगी और उसके बाद जो भी बस आई उसमें चढ जाऊंगी ,बस नहीं आई तो सडक के उस पार रेस्ट्रां में चली जाऊंगी...एक...दो...तीन...
                                                                *           *          *
आर्या कालॉनी के पास स्कूल बस आकर रुकी.क्लीनर दरवाजा खोलकर नीचे खडा हो गया. चार से दस साल के बीच के बच्चे एक एक करके उतरने लगे.दीपा के उतरते ही उसने उसे छाती से भींच लिया और गाल पर कसकर चुम्मा दिया और नीचे उतारा.खिडकी में से देखनेवाले और पीछे से उतरनेवाले बच्चे जोर से हंस पडे.ड्राइवर ने क्लीनर की ओर हिकारत भरी नजर से देखा.क्लीनर ने ड्राइवर से कहा,"बडी प्यारी बच्ची है !" जैसे अपनी हरकत केलिए सफाई दे रहा हो.ड्राइवर को एल. के. जी. में  पढनेवाली अपनी बेटी याद आई.कुछ कहने को हुआ फिर चुप रह गया.
अपमान,शर्म जैसे शब्द नहीं जानती थी दीपा.पर उसे कुछ अजीब जरूर लगा था ,इसीलिए सिर झुकाए धीरे धीरे पैर खींचते चलने लगी.
बस में से सबसे आखिर नीचे कूदी ग्यारह साल की शक्ति.उसकी नजर दस कदम आगे चलनेवाली दीपा पर थी.उसे पुकारना चाहा ,पर चुप रह गई.अपार्टमेंट के बाहर दीपा की मां खडी थी और दीपा का हाथ पकडकर वह अंदर चली गई.शक्ति भागकर सीढियां चढ गई और अपने फ्लेट का दरवाजा जोर से खटखटाते हुए तीन बार अपनी मां को पुकारा."क्या है शक्ती!एक मिनट भी नहीं रुक सकती?" कहती हुई सविता ने दरवाजा खोला.बस,शक्ति ने अपना बस्ता सोफे पर पटका और कहा,"मां ,फौरन हमें दीपा के घर जाना होगा,"और दरवाजे की ओर मुडी.सविता ने उसका हाथ पकडकर रोका और पूछा," इतनी जल्दी किसलिए,बता?"
"हमारे स्कूल बस का क्लीनर भैया अच्छा आदमी नहीं है,मां! दीपा को बिना वजह छूता रहता है.मुझे वह गलत लगता है.आज उसने उसे चूम भी लिया.सिर्फ दीपा को ही नहीं,बाकी छोटे बच्चों के साथ भी ऐसा ही करता है..." इतना कहकर वह हांफने लगी.यह सुनकर सविता अवाक रह गई.
"दीपा बहुत उदास है , हम जाकर आंटी को उस क्लीनर के बारे में बताएंगे मां! रेणू के आने से पहले लौट आएंगे," शक्ति ने कहा.अपनी उम्र से ज्यादा परिपक्व सोच,और ऊपर से रोज टीवी पर खबरें देखना, जाहिर है कि शक्ति की नजर से ऐसी बतें छुपती नहीं.शक्ति का दीपा की मां को सचेत करने का प्रस्ताव सविता को अच्छा लगा.उसने सोचा,स्कूल बस में जानेवाले बाकी बच्चों के मां बाप से भी बात करके शिकायत करना ठीक होगा,

                                                  *                *               *

तीन...चार...पांच...गिनती पूरी होने से पहले ही  वह बस थोडी दूर जाकर अचानक रुक गई  .  उसमें से दो लडके और तीन लडकियां उतरे और रेणू की तरफ चलकर आए.बस चली गई.

"अरे कितनी देर से खडी हो?बस नहीं आई?" रेणू के पास आकर दोनों में से एक लडके ने पूछा.पीठ पर बैकपैक लटकाए लाल टी शर्ट पहने उस लडके की ओर रेणू ने सकपकाई नजरों से देखा." चेतन ने पहले तुम्हें यहां देखा,तो हम भी बस रुकवाकर उतर गए," एक लडकी बोली,और हल्के से आंख मारकर इशारा किया.पांच  अनजान लोग उससे ऐसे बात कर रहे थे जैसे उसे अच्छी तरह जानते हों.बात रेणू की समझ में आ गई तो वह भी मुस्कुरा उठी और बोली,"हां रे , आज बस के आने में देर हो गई..." . तबतक पास खडे होकर उसे परेशान करनेवाला लडका चुपचाप खिसग गया.अपने दोस्त के पास गया और बाइक पर बैठकर दोनों चले गए।  
तब चेतन ने अपनी जेब से एक कार्ड निकालकर उसे देते हुए कहा, " अगर कभी आपको इस तरह की परेशानी हो,या किसी भी तरह की मदद की जरूरत हो तो इसपर लिखे नंबर पर फोन करें.यह एक हेल्प लाइन का नम्बर है.एरिया के हिसाब से वाट्स अप ग्रूप्स भी हैं.फोन आते ही हम तीन चार लोग मदद केलिए पहुंच जाते हैं.आप अपने बारे में,परिवार,दोस्त सबके  बारे में विवरण देकर हेल्प लाइन का सदस्य बन सकती  हैं.अपने दोस्तों को भी इसके बारे में बताइए." रेणू ने कहा," धन्यवाद,जरूर सदस्य बनूंगी!" उसने मुस्कुराकर कृतज्ञता प्रकट की.

                                                *                         *                         *
पहली मंजिल के कोने के फ्लैट का दरवाजा वह लगातार पीटता जा रहा था. रेणू बैठकर पढ रही थी. उसने अपनी  छोटी बहन से,जो वहीं बैठकर टीवी देख रही थी ,अंदर जाने को कहा और दरवाजा खोलने उठी.शक्ति को टीवी का कार्यक्रम 
बीच में छोडकर जाना बुरा लगा और पैर पटकती अंदर चली गई.सविता खाने की मेज पर प्लेट और खाने के बरतन 
सजा रही थी.उसके  बदन में हल्की सी कंपकंपी उठने लगी.रेणू से कहा,"तुम भी अंदर बैठकर पढो.मैं बात करके भेज दूंगी."मां की बात को अनसुनी करके रेणू ने जाकर दरवाजा खोला और रास्ता रोककर खडी हो गई.आनेवाले से उसने 
पूछ,"क्या बात है अंकल , आप इस वक्त यहां?"पडोसी फ्लैट में रहनेवाला महाशय,जो पीछे खडा तमाशा देख रहा
 था,रेणू को देखते ही चुपचाप  खिसक गया.
रेणू के सवाल का जवाब न देकर उसे हल्के हाथ से परे हटाकर वह आदमी अंदर आ गया.उसके साथ ही ऑल्कहाल की
 तेज बू की भभक भी अंदर आ गई.वह सीधे जाकर सोफे पर बैठ गया और भारी पलकें उठाकर सविता को देखते हुए 
कहा," तुम्हारी बेटी बडी बदतमीज है !घर आए आदमी से सवाल करती है कि क्यों आए?"
"यह लडकियों वाला घर है.इस वक्त आपका आना ठीक नहीं है ना?"सविता की आवाज में अब भी  कंपकंपी थी.
"लडकियों वाला घर है इसीलिए तो हालचाल  पूछने आया हूं.मेरे दोस्त के बच्चे सही सलामत हैं या नहीं यह जानना 
मेरा फर्ज बनता है. पर मैंने जो मदद की  उसे कौन याद रखेगा? मेरा यहां आना अब खटकेगा ही ना ?"उसने ताना कसा। 
सविता को मालूम हो गया कि अब यह श्ख्स हिलनेवाला नहीं,इसलिए वह खाने के मेज के पास कुर्सी पर बैठ गई. वह 
सोच में पड गई, जब पति अचानक चल बसे तो इसी आदमी ने बहुत मदद की थी.बाद में भी पति का पेन्शन वगैरह दिलाने में भाग दौड की.यह सविता के पति के दफ्तर में ही काम करता है.पर कुछ समय बाद उसका रवैया बदल 
गया.पिछ्ले तीन महीनों से पीछे पड़ गया है। जब मन किया घर आ जाता और परेशान करता रहता.नशे में धुत्त आदमी का क्या भरोसा,कुछ अनहोनी हो गई तो पडोसियों को मुंह दिखाने के भी काबिल नहीं रहेगी.रेणू बार बार मां से झगडा करती कि या तो उनके घर जाकर पत्नी को उसके बारे में बताएंगे या पुलिस में शिकायत करेंगे.पति की मौत के वक्त उसकी पत्नी आई थी,पर उसके बाद उससे कभी नहीं मिली.क्या जाने शिकायत करने पर उल्टा हमें ही गलत ठहरा दे ! उसे लगा,अबोध दीपा और सबकुछ जाननेवाली मेरी असहाय परिस्थिति में कुछ खास फर्क नहीं है.
रेणू ने देखा कि वह आदमी उसकी मां को निहारता जा रहा है .उसका ध्यान बटाने केलिए उसने कहा,"अंकल,अंधेरा हो गया ,अब आप घर जाइए." वह आदमी भडक उठा और गुस्से से बोला," पहले तू अपना मुंह बंद रख !"सविता को बुरा 
लगा.खुद रेणू के पिता ने भी कभी इस तरह उसे नहीं डांटा  था.

रेणू से अब चुप नहीं रहा गया दुःख और आवेश उमड पडे. शाम को चेतन का दिया हेल्प लाइन कार्ड किताब में से झांक रहा था.बाहर निकले हिस्से पर 'रीच आउट' शब्द चमक रहा था.उसे बाहर निकाला और दूसरे हाथ में फोन लिया. फोन में दर्ज किए नंबर देखने लगी तो एक नंबर पर नजर पडी.बाल्कनी में जाकर नंबर लगाया.पांच मिनट बात करके वापस अंदर आई और किताब लेकर बैठ गई.बस पांच छः मिनट बाद चौथी मंजिल पर रहनेवाली चंद्रकला सविता को बुलाते हुए अंदर आई और पूछने लगी,"कैसी हो दीदी?"उसके पीछे पीछे उसका पति और दो बच्चे अंदर आ गए.लगा जैसे हडबडी में घर से निकले थे.चंद्रकला नाइटी पहने थी और उसका पति अभी नाइट ड्रस में ही था.
"क्या बात है दीदी,आजकल आप कहीं दिखाई नहीं देती? सोसाइटी की मीटिंग में भी आना छोड दिया.ठीक तो हैं ना?" यह पूछते हुए वह जाकर सविता की बगलवाली कुर्सी पर बैठ गई.उसका पति सोफे पर बैठकर अखबार पढने में डूब गया.पर सविता को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.इस तरह चंद्रकला कभी मिलने नहीं आती.बाहर कभी आमने सामने आ जाते तो मुस्कुराकर हालचाल  पूछकर चल देती थी.उन दोनों के बीच औपचारिक संबंध थे,बस.आज अचानक इस वक्त यह अपने पूरे परिवार के साथ कैसे आ गई?
चंद्रकला दुनिया भर की बातें बताने लगी.अपार्ट मेंट्स में नए आए लोगों के बारे में,उनकी अच्छाइयों और बुराइयों के बारे में बोलती ही जा रही थी.उसका पति जैसे अखबार का एक एक हर्फ पढने में मजा ले रहा था.उसकी आंखें अखबार में ही गडी रह गईं. शक्ति और चंद्रकला के बच्चे खूब ऊधम मचा रहे थे और उन्हें रोकनेवाला कोई नहीं था.रेणू चुपचाप पढाई अर रही थी.
उस नशे में धुत्त आदमी की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा था तो वह जरा सा हिला,जैसे उठना चाहता हो .उसे शायद लगा
 यहां अब रहना ठीक नहीं होगा। जिस मकसद से आया था वह पूरा होने की उम्मीद ही नहीं रही !

Friday, January 3, 2014

१. तितिक्षा

मेरा मन कर रहा है मौन आक्रोश

अविराम सहस्राधिक हृदयों में

गरमी पैदा कर हक्का बक्का करनेवाला था तू

सहानुभूति केलिए

किसीसे तसल्ली पाने केलिए

छटपटाते हुए प्रतीक्षा करना

कितनी भयंकर स्थिति है!

अनबुझ प्यास से लपलपाती जीभ से

सूरज की किरणों पर चढकर

प्रवाहित होना था तुझे

लोगों की भीड भरे जंगल में

एक अनाम पत्ते की तरह चिपके हो

यह कितने दुर्भाग्य की बात है !

तुम्हें ग्रस लिया है किसी सामाजिक रुग्मता ने

पूंछ कटे तारों को देखते हुए

रात के छोर पर चलते चलते

कामना के झुलसे पलों को खोते हुए

अब इस तरह

अनजान भयविह्वलता में दग्ध होकर

मौत को धीरे धीरे चूसते हुए

तुम्हारा एकाकीपन

होकर शमित दमित

पैदा करे किसी एक आकार को

मालूम नहीं

किसी अज्ञात तितिक्षा का

उदय हुआ हो तुझमें शायद!

अब तुझे नहीं बुलाऊंगा वापस

अब तेरी क्रांति के पग

चुस्ती से उठें

इस प्रातः की राह पर

धीरे धीरे चलते चलो.

..............................................

२.विषाद-योगी

अंधकार की लहरों से भरा

अनंत तक फैला मैदान

अहंकार नहीं मिटता मेरा

इसलिए घायल हूं मैं

फिर भी नहीं छूटता मेरा अहंकार

वहां...वह देखो मेरा साथी

धमकाए तो भी

उसके सिवा

कोई साथी मनुष्य का न होना

कितने बडे विषाद की बात है!

मंत्र तंत्र फूंकनेवाले

यंत्रवादी कहां गए?

हमको घेरे हैं मनुष्यों के कंकाल

और सुप्त निश्शब्द

अतीत के वियोग में

घिर आए हैं मन्मथवेदना के वलय

यहीं मधुपान की गोष्ठी

यही है सुरत प्रदेश

सामने समुद्र के राक्षसी मुष्टि के आघातों से

घिस घिसकर टूटे बिना

रिसते खूनी घावों से भरे

क्षतविक्षत हृदय लेकर

बिखरे हैं येराडा पहाड के पत्थर

समुद्र तट पर विषाद योगी

कर रहा है दुःख का अन्वेषण

इस दीर्घ निशीथि में

श्मशान शय्या पर.

अब सुप्रभात होने की

सूचना नहीं है कहीं!


मूल कविता : डा.धेनुवकोंड श्रीराममूर्ति

अनुवाद : आर.शांता सुंदरी

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अक्षरों का अर्तनाद

                                                                  मूल तेलुगु : डा.धेनुवकोंड श्रीराम मूर्ति
                                                                  हिंदी अनुवाद : आर.शांता सुंदरी


क्षमा करो मुझे
संक्षिप्ताक्षर बन सिमटना नहीं चाहता मैं
इसी लिए जा रहा हूं पराया देश बिककर
माफ करो मुझे
ये भयानक प्रवास
हाहाकार
गाली गलौज़
पुतले जलाकर अग्नि कांड
बीच सडक कर्म कांड
ये सारे रास्ते
बन गए नरक द्वार
स्व-नियंत्रित
रहस्यमयी कुतंत्र मॆं
कब जी पाएग
हरेक नागरिक आराम से?

यहां पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
काम नहीं करता इन्सान पर
बस,है तो सिर्फ धनाकर्षण!
शरीर पर घाव है
पर कहां है नहीं मालूम
आकुल व्याकुल है मन पीडा से


महामाया के तंत्र-योग में है
प्रकाश
सोख लिया जिसे शरीर ने
जाना है जिस देश
वहां गए बिना ही
गुज़रते जा रहे हैं दिन
गली में
किसीके कदमों की आहट
आशा जागती है मन में
कहीं शांति की पदचाप तो नहीं
आज के शिशिर ऋतु केलिए
कल के पत्ते
पीले पडकर
झर रहे हैं

देश की देह को
नदियों में
न बांटनेवाले देश में
इन्सान में भलाई है जिस देश में
पेडों पर कोंपलों की आशाएं
फूटने के देस में
हे प्रभू!
ले जाओ मुझे!!


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जीवन एक यादें अनेक


देह के वस्त्र को
कृष्णा नदी में संचय करते समय
शरीर छोडने की आहट
छोड गए जो यादें मेरे पिता
घेरने लगी हैं मुझे.
कभी किसीके आगे
पसारा नहीं था हाथ
नहीं दिया था किसीको धोखा
नहीं झुकाया था सिर किसीके सामने
पिता जी का रहा
इच्छारहित जीवन
दुःख के मौसम का जीवन
हमेशा मांगते थे
’अनायास मृत्यु’
महामौनि की मौत.

मेरे बाल्य के प्रवाह को
मोड देनेवाले पिता
नादान उम्र में
सावधान और सतर्क रहने की सबक
सिखानेवाले पिता .

खुद को समझने ही लगा था
जब गुज़र गई मां भी
एकांत में रुदन
अंतर्दाह की जलन
अनुभव के स्वप्नों का असहाय विषाद
जीवन एक
यादें अनेक.

देह जब बनने लगे निर्देह
तब पिता की शव-यात्रा.

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गांव डूब गया (सबमर्ज्ड विलेज)


आंखे बंद नहीं
पर देख रहा हूं सपना
अचेतन स्वप्नावस्था में
चलते,तैरते,उडते हुए
धीरे से,धीरज से,भोलेपन से
शाश्वत विनाश में
जल-समाधि में डूबे गांव को
डूबे आदमी के निशान को
ढूंढ रहा हूं मैं.

धेनु विचरता था जिस पहाड पर
राम की अटारी के ऊपर
पीपल पेड के नीचे
झरती यादें
कान्हा की बांसुरी में भरी
चांदनी की हवा
ईश्वर - कुएं की रहट पर
रसीले सुर बजानेवाली उंगलियां
चौपाल पर सुनाया गया
सम्मोहित कर देनेवाला कविता-गान
सुख-शांति से भरा गांव का जीवन
आम इन्सान और महात्मा
बसते थे जहां सुगंध बन महान
नदी के हृदय को हाथों से छूनेवाली
जल-यज्ञ संस्कृति का
ब्रेंड एंबासिडर जैसा
गुंड्लकम्म!*

***

परियोजना का प्रतिबिंब
दिखता है जल्लद के चेहरे-सा
खेत
सूख गए पानी के अभाव में पिछले साल
डूब गए बाढ की चपेट में आकर आज

***

आंसुओं से तप्त
क्षुब्ध क्षण
लेकर देह असंतृप्त कामनाओं की
उतरकर पितृलोक से नीचे
आदिलक्ष्मी कामेश्वरी की करते हुए अर्चना...
अपनी कोई वस्तु यहीं छूट गई
ऐसा सोचकर
उसे ढूंढनेवाले पूर्वज
चमेली के उपवनों
केतकी के परागकणों
रसभरे फूलों के उद्यानों
और तंबाकू के बागानों में
हरे कोमल पत्तों को तोडते
मदभरे गान
गेहूं की बालियों के
फूलों के हार
***

यादें मिटी नहीं
चक्कर काट रही हैं
नदिया के छोरों पर
लिपि नहीं आती समझ में
देख रहा हूं झुककर घुटनों के बल.

*एक नदी का नाम

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Monday, April 1, 2013


कृष्णुडु
कृष्णुडु
ए .कृष्णा राव  का पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों का अनुभव है। दिल्ली में लगभग दो दशकों से कार्यरत। पिछले बारह सालों से ‘आन्ध्र ज्योति’ दैनिक में दिल्ली ब्यूरो के चीफ के पद पर काम कर रहे हैं। इससे पहले कुछ और पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। वह केवल पत्रकार ही नहीं, लेखक और कवि  भी है। इनके स्तम्भ ‘इण्डिया गेट ‘शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। कवितायें कृष्णुडु  के नाम से लिखते हैं। इनके दो कविता संग्रह छप चुके  हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य संबंधी आलेख भी प्रकाशित हुए हैं। उनकी एक कवि‍ता। तेलुगु से इसका अनुवाद आर.शान्ता सुन्दरी ने कि‍या है-
रो रोकर माँ की आँखों सा
लाल हुआ आसमान
खाने को कुछ  नहीं है
‘माँ, भूख लगी है…’
शून्य में ताकती माँ
कुछ नहीं बोली
उसकी आँख बचाकर
धीरे से निकला बाहर
उखड़ते प्राणों में
साँस लौट आई फिर
गलियों की नीरवता को
तोड़ती सेना की गाड़ियाँ
दूर कहीं से सवाल करते
आर्तनाद…
कल परसों तक
सबक सिखाती पाठशालाएं
बन गई हैं सैनिक शिविर
हमारे नन्हे पैरों के स्पर्श से
पुलकित हरी दूब  को
कुचलती जूतों की कवायदें
किसके साथ खेलूँ?
घोंसलों से छितराए पंछियों जैसे
परिवार
निश्शब्द है
बौद्ध मन्‍दि‍र
शव सा बैठा है बुद्ध
इर्द-गिर्द रिसते खून पर
भिनभिनाती हैं मक्खियाँ
घर में माँ नहीं दिखती
ध्वस्त हैं आनेवाले कल के सपने
सड़क पर मौत का वीभत्स
हाथ पीछे बंधी लाशें
लगता है बारिश होगी
कहाँ हो माँ?
कब आओगी?
तुमने कहा था स्वर्ग है
पर वह कहाँ है?
रुकी जीप …
उतरा अंकल …
‘बाबा से मिलोगे?’
‘जी अंकल !’
‘देख तेरे सीने में है
जारे अपने बाबा के पास जा… ‘
पाँच गोलियों में छिपे
पंच-प्राण
आसमान ने भिगोया देह को
आँसुओं से
तभी बादलों की ओट  से
निकल आया बालचंद्र
देखते हुए उसे
बाबा में मिल गया मैं

Sunday, January 6, 2013


द्वैत
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शरीर हो गया एक ऐतिहासिक दोष
दो होंठ,दो गाल
दो स्तन,दो जांघें...
युगल सौंदर्य
दो दशकों में ही जैसे ज़िंदगी हो गई खत्म

ज़िंदगी इतनी तंग हो गई कि
ज़रा सा हिलो तो उधडने लगती है
दीवारों का रहस्य खोले बिना ही
ग्राफिती बदरंग होने लगी
कल न जाने किसकी बारी है?
गलत मत समझना,
लगने लगा है
पास खडा हर आदमी जैसे
जांघों के बीच अपने
भाले को लेकर चल रहा हो
समंदर और आसमान को मिलाकर बुनने पर भी
इस अनादि प्रस्तर युग के नंगेपन को
ढकने के लिए
हाथ भर का कपडा नहीं मिलता

आंख खुलने पर ही तो
पता चलेगा ना
कि सुबह हो गई
जिस अंग में आंखें ही नहीं
उसके लिए
बधिरांधकार ही आनंद है
आंतों को ही नहीं
दिल को भी उखाडते हुए
बदन में अंधेरा सीधे खंता बन
धंस जाता है
गलत मत समझना,
कीडों से कीटनाशन की आशा करते हुए
मृत्यु से अमृत मांगते हुए
जानवरों से जानवरों का बहिष्कार कौन करता है?
मानवता के युटोपिया में
सिग्नलों के बीच मुख्य सडकें
जब बन जाती हैं खामोश आक्रंदन
कान फटनेवाले
सवालों के यहां गोलियां उग रही हैं
तो क्या हुआ?
विवेक पर लाठियां बरस रही हैं
झूठी सहानुभूति,गंदी गालियां
आंसू पोंछ रही हैं
सुरक्षा दलों का फैलाव
आंसू गैस के बादल बन
विश्वासों पर छाने लगा है
शहर एक मृत्यु का हथियार बन गया
अपना और पडोस का घर
हरा घाव बन अकुलाने लगते हैं
हम दोनों का अस्तित्व कायम रहना हो
तो तुम्हें मुझमें
मनुष्यता बन स्खलित होना पडेगा
मुझे तुम्हारे अंदर
मातृत्व बन बहना होगा
शरीर के दोषी हो जाने के बाद
प्राणों के स्पंदन बुझ जाने के बाद
दरिंदगी में तर्जुमा हो जाने के बाद
मरीचिकाओं के बांझपन मेंं
प्रवासी होकर प्रवेश करने के बाद...
मां भी तेरे लिए
एक गलत रिश्ता बनकर रह जाएगी...
गलत मत समझना,
अब यहां लाशघरों के सिवा
प्रसवघरों की कोई ज़रूरत नहीं!

मूल तेलुगु कविता : पसुपुलेटि गीता
अनुवाद : आर.शांता सुंदरी

Monday, November 19, 2012


‘प्रेमचंद घर में’ का तेलुगु में अनुवाद

सभी मानवीय सम्‍बन्‍धों में पति-पत्नी का सम्‍बन्‍ध अत्‍यंत घनिष्ट है और अत्यधिक समय तक उनका साथ बना रहता  है। पति की मृत्यु के बाद उनके साथ बिताए जीवन के बारे में ईमानदारी से लिखने का चलन भारतीय साहित्य में कम ही देखने को मिलता है। ‘प्रेमचंद घर में’ में शिवरानी देवी ने यह करके दिखाया।वार्तालाप के माध्यम से अधिक और स्वगत-कथन के रूप में कई जगह उन्होंने जो भी लिखा उन बातों से न केवल प्रेमचंद के महान व्यक्‍ति‍त्‍व का, बल्कि लेखिका की विलक्षण प्रतिभा का भी परिचय मिलता है। कभी-कभी आगे रहकर उन्होंने प्रेमचंद का मार्गदर्शन भी किया था, ऐसे कई उदहारण इस पुस्तक में मिल जाते हैं। शिवरानी देवी की सूझ-बूझ और निडर व्यक्तित्व उभर आता है।
प्रेमचंद से अपरिचित तेलुगु साहित्य प्रेमी विरले ही होंगे। प्रेमचंद घर में पति, पिता के रूप में कैसे थे और शिवरानी देवी और प्रेमचंद का सम्बन्ध कितना विशिष्ट था, यह जानने के लिए सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये।
मूल पुस्तक में दि‍ये गये प्रोफेसर प्रबोध कुमार (प्रेमचंद के नाती) और स्वयं शिवरानी देवी के कुछ शब्दों को भी अनुवाद में लिया गया है।(शिवरानी देवी का पूरा वक्‍तव्‍य और प्रबोध कुमार के, ‘मेरी नानी अम्मा’ से कुछ अंश)।

प्रेमचंद में कहीं भी पुरुष होने का अहंकार नहीं था। वह पत्नी की बहुत इज्ज़त करते थे। उनकी सलाह बात-बात पर लेते थे। अगर किसी विषय में मतभेद रहा भी तो बड़े प्यार से समझाते थे। पत्नी से उन्हें बेहद प्यार था। शि‍वरानी देवी बहुत स्वाभिमानी थीं और प्रेमचंद को प्राणों से भी अधिक मानती थीं। प्रेमचंद की ज़िंदगी और मौत से जूझने वाले समय का उन्होंने ऐसा जीवंत वर्णन किया है कि  पढ़ने वालों  का कलेजा मुँह को आ जाता है। प्रेमचंद के बारे में, उनकी रचनाओं के बारे में, साहित्यिक व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पर शिवरानी देवी की किताब में इन सब बातों  के साथ-साथ बहुत ही अन्तरंग बातें, जो केवल एक पत्नी को ही मालूम होती हैं, उनका ज़िक्र भी किया गया है। पति-पत्नी के बीच सम्‍बन्‍ध कितने सुन्दर, गहरे और प्यार से भरे हो सकते हैं, यह जानने के लिये भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
इस पुस्‍तक का तेलुगु में अनुवाद शांता सुंदरी ने कि‍या है। इसका शीर्षक तेलुगु में ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’ (इम्ट्लो मतलब ‘घर में’) है। पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने से पहले यह धारावाहिक के रूप में ‘भूमिका’ नामक मासिक पत्रिका में, जनवरी 2009 से जुलाई 2012 तक प्रकाशित हुई। पहली क़िस्त के बाद ही कइयों ने इसे बहुत पसंद किया। प्रेमचंद की केवल रचनाओं से परिचित पाठकों को उनके व्यक्तित्व के अन्दर झाँककर उन्हें अच्छी तरह समझाने का अवसर मिला। प्रसिद्ध कवि‍ वरवर राव ने अनुवादक शांता सुंदरी को दो-तीन बार फोन करके बताया की कुछ अंशों को पढ़कर उनकी आँखें नाम हो गयीं। तेलुगु के अग्रणी लेखकों ने इसे पुस्तक रूप में देखने की इच्छा ज़ाहिर की और इसे सम्‍भव बनाया ,हैदराबाद बुक ट्रस्ट की गीता रामास्वामी ने।
पुस्‍तक: ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’
मूल लेखि‍का : शि‍वरानी देवी
अनुवाद : शांता सुंदरी
कुल पन्ने : 274
मूल्य : 120 रुपये
प्रथम संस्करण : सितम्बर, 2012
प्रकाशक : हैदराबाद बुक ट्रस्ट,
प्लाट नंबर 85, बालाजी नगर,
गुडीमलकापुर, हैदराबाद- 500006
This entry was posted by author: admin on Saturday, November 17th, 2012 at 7:07 am and is filed under परिक्रमा | Tags: · , , , , , You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site. | चिट्ठाजगत | Blogvani.com

One Comment »

  • sumit said:
    शि‍वरानी देवी की कि‍ताब ‘प्रेमचंद घर में’ का तेलुगु में अनुवाद में करके शांता सुंदरी जी ने महत्‍पवूर्ण कार्य कि‍या है। इसके लि‍ए उन्‍हें धन्‍यवाद। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि‍ अब तक इस तरह की महत्‍वपूर्ण कि‍ताबों का अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद क्‍यों नहीं हुआ है। तमाम अकादेमि‍यां और संस्‍थाएं क्‍या कर रही हैं। क्‍या कुर्सी और पुरस्‍कार के लि‍ए जोड़-तोड़ करना ही साहि‍त्‍य के कर्णधारों का काम रह गया है।

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Original text


Sunday, November 18, 2012


सूपर सिंड्रोम
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तेलुगु मूल : सलीम
अनुवाद : आर.शांता सुंदरी
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गुरुवार का दिन था.शाम के छः बज रहे थे.सब्ज़ी खरीदने थैली लेकर चप्पल पहनने लगी तो बेटी मधु ने कहा,"मां मैं भी साथ चलूं?"
"नहीं बेटा,तू पढाई कर.मैं आधे घंटे में आ जाऊंगी."
मधु ने मीठी हंसी हंसते हुए कहा,"कहने पर भी नहीं मानती ना? बडी मंडी में सब्ज़ियां सस्ती मिलती हैं,यही बहाना बनाकर जाती तो हो,पर सोचो,जाने आने का आटो का खर्चा भी जोडकर देखो तो सस्ता थोडे ही पडता है?"
मैं तो हर हफ्ते यही सुनती हूं,आदत सी हो गई! मैं बाहर निकलने लगी तो पीछे से मधु ने कहा,"अब थोडे दिनों की बात है.फिर घर के पास ही फुड वर्ल्ड सूपर मार्केट खुल जाएगा.तब हम वहीं से सारा सामान खरीद सकेंगे!"
"मुझे तो बेटा,बडी मंडी जाना ही अच्छा लगता है.वहां सब जाने पहचाने लोग हैं."
"अरे आदत वादत छोडो मां.अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि अपनी सहूलियत देखनी पडती है.दाल,चावल,सब्ज़ी,मसाले,फल सब एक ही छत के नीचे मिल जाते हैं तो कितना अच्छा है ना? और फिर साफ करके पेकेटों में बंद होकर बेचे जाते हैं.कीमतें भी ज़्यादा नहीं होतीं."
मैं उसे कुछ जवाब दिए बिना बाहर आकर मंडी के लिए आटो पकड ली.
मैं आटो से उतरकर पैसे चुकाने लगी तो रामुलम्मा ने आवाज़ दी.वह औरत पत्तेवाली सब्ज़ियां बेचती है.मुझे देखते ही उसका चेहरा खिल उठा.मैं भी उसकी तरफ खिंची चली गई.
"पिछले हफ्ते नहीं आई बीबी जी?मैं ने बहुत इंतज़ार किया था!कहीं बाहर गई थी क्या?"रामुलम्मा ने पूछा.
मैं उसके आगे बिछी बोरी पर से हरा धनिया,कडी पत्ता,पुदीना वगैरह लेते हुए कहा,"नहीं, बुखार हो गया था."
"तभी कहूं कि इतनी कमज़ोर दिख रही हो आप!मैं भी सोच रही थी कि कम से कम फूल खरीदने तो ज़रूर आती हर वीर वार को!"
"अच्छा कितने पैसे हुए,बोलो?"मैंने पैसे चुकाए और पूछा,"तेरी बेटी की गिरस्ती कैसी चल रही है?सब ठीक तो है ना?"
"क्या बताऊं बीबी जी?बार बार पैसा मांगता है मेरा जमाई.कहां से लाऊं? अभी परसों फिर पच्चीस हज़ार मांग रहा था.कहां से लाती इतना रुपया?"
मैं चुप रही.मन खराब था पर कुछ सूझा नहीं कि क्या कहूं.फिर भी उसे दिलासा देकर आगे बढ गई.
चार कदम चलकर सब्ज़ी वाले के पास पहुंची.कनकय्या सब्ज़ी बेचता था.सत्तर साल की उम्र,उसके तीन बेटे थे,जो अच्छी नौकरियां करते थे.फिर भी उसे धूप बारिश और सर्दी में सब्ज़ी की मंडी आना पडता.एक भी बेटा उसकी देख भाल करने को तैयार नहीं था.पहले रेडी पर सब्ज़ी डालकर गली गली घूमता था,पर अब कमज़ोरी की वजह से एक ही जगह रहकर बेचता है.
कभी मेरे पूछने पर उसने अपनी रामकहानी मुझे बताई थी.
मुझे देखते ही बच्चे की तरह मुस्कुराया.सामने के दांत टूट जाने से उसका मुंह पोपला हो गया था."पिछले हफ्ते आप नहीं आईं तो समझा किसी और से सब्ज़ी खरीद ली होगी,"उसने कहा.
"हमेशा तुमसे ही लेती हूं ना?और कहां जाती?"
"तुम्हारे बेटे कैसे हैं?"मैंने पूछा और उसकी मुस्कुराहट पुंछ गई.बहुत देर तक सब्ज़ी तोलते हुए चुप रहा.मुझे लगा उसकी आंखें नम हो गईं हैं.फिर उसने सब्ज़ी मेरी टोकरी में डालते हुए मेरी ओर देखा और कहा,"सच कहूं बेटी? कल को मैं मर गया तो लाश को ठिकाने लगाना तो दूर ,देखने भी नहीं आएंगे.तुम जैसी कोई भला मानुस ही शायद वह काम कर दे,मैं भगवान से रोज़ यही दुआ मांगता रहता हूं!"
इन लोगों की बातें सुनकर मेरा मन खराब तो होता है,पर उन्हें लगता है कि चलो हमार दुखडा सुननेवाला कोई तो है!मैंने हिम्मत बंधाते हुए कहा,"यह कैसी बातें कर रहे हो?तुम्हें कुछ नहीं होगा.सौ साल ज़िंदा रहोगे!"
"नहीं बेटी ,मुझे ऐसी आशा बिल्कुल नहीं है.अकेले जीना बहुत मुश्किल है.सबके होते हुए भी मैं अकेला हूं.ऐसी ज़िंदगी भगवान किसीको न दे!"
अपनी तरफ से उसे तसल्ली के दो चार शब्द कहकर मैं फूल खरीदने चली गई.मस्तानम्मा ने भी मेरे पिछले हफ्ते न आने की वजह पूछी.हमेशा मैं उससे पांच हाथ चमेली के फूल खरीदती हूं.मुझे देखते ही फूलों की तरह हंस् दी और पूछा,"क्या बात है?पिछले हफ्ते नहीं आईं?"उसकी हंसी बडी खूबसूरत् है.मुझे वह हंसी बहुत अच्छी लगती है.एकदम स्वच्छ और निष्कपट.और वह मुस्कुराती भी बहुत है.शायद इसके शौहर  कहता हो कि तेरी हंसी बडी खूबसूरत है!
"दस हाथ फूल मालाएं देदूं?"उसने पूछा.मैं तो हमेशा पांच हाथ ही लेती हूं,सॊ कहा कि पांच काफी हैं."क्यों बहन जी,हमेशा सारे फूल भगवान को ही चढा देती हो? खुद नहीं बालों में सजाती?"उसने पूछा.
पर वह मानी नहीं.कुछ फूल खुद मेरे बालों में गूंथने की ज़िद करने लगी.बाज़ार में और आना कानी करना ठीक न समझकर मैं मान गई.मस्तानम्मा के हाथ मे बीस रुपये रख दिए.उसने हैरान होकर पूछा,"इतने रुपये किसलिए?"
"दस हाथ के फूल लिए हैं ना?"
"नहीं जी,मैं तो सिर्फ पांच के पैसे लूंगी.मैंने उतना ही बेचा है.बाकी तो मैं तुम्हें अपनी खुशी से दे रही थी."
"अरे यह क्या बात हुई? मैं जानती हूं फूल बेचकर तुम्हारे पास कितने पैसे बचते हैं.लो,ये दस रुपये भी ले लो!"मैंने ज़बर्दस्ती दस का नोट उसे पकडाने की कोशिश की.
"हां,मैं फूल ज़रूर बेचती हूं,पर बहन के बालों में फूल लगाकर उसके पैसे वसूल नहीं कर सकती!"
मैंने उसे शुक्रिया कहा और जवाब में वह फिर फूलों की तरह हंसी.
घर पहुंचते पहुंचते सात बज गए.
"देखा मां कितना टाइम लगा दिया.पास में ही सूपर मार्केट खुल जाएगा तो वक्त ज़ाया न करना पडेगा ना?"मुझे देखते ही बेटी बोली.

                                                * * *

हमारे घर से सौ गज़ की दूरी पर फूड वर्ल्ड सूपर मार्कॆट खुल गया.उद्घाटन समारोह में कोई अभिनेत्री भी आई थी.पूरे मुहल्ले में पेंफ्लेट बांटे गए.अखबारों में बडे बडे विज्ञापन दिए गए.
मधु मचल उठी,"चलो मां ऊड वर्ल्ड चलें.खुद देख लेना कि यह कितनी शानदार दूकान है.फिर कभी तुम मंडी जाने की बात नहीं करोगी.अमेरिका जैसे देशों में तो सिर्फ ऐसी ही दूकानें होती हैं.हमारे जैसे वे सडकों के किनारे रेडियां नहीं लगाते और न ही गली गली घूमकर चीज़ें बेचते हैं.सब काम सलीके से किए जाते हैं.देखा, अमरिका से हम कितने पिछडे हुए हैं?"
"अच्छा सूपर मार्केट खोल दिए तो मतलब तरक्की कर ली,और गली गली घूमकर बेचा तो पिछड गए?मैं नहीं मानती तेरी बात!"मैंने कहा.
"सिर्फ इतना ही नहीं मां,अमेरिका में सेल फोन हमसे पहले आया था.उनके देश में आइमेक्स सिनेमा थियेटर खुलने के कई साल बाद हमारे देश में इनका दौर शुरू हुआ.इस दौड में हम रफ्तार नहीं बढाएंगे तो हमेशा के लिए पीछे ही रह जाएंगे!सोचकर ही खराब लगता है..."
"सुनो,इन्सानी रिश्ते कितने बेहतर बन रहे हैं,इसी बात से विकास को आंकना चाहिए,मशीनी प्रगति से नहीं!"
"मां वक्त बदल रहा है.हमारी पीढी की सोच अलग है...चलो बातें बाद में भी कर सकते हैं,पहले फूड वर्ल्ड देख आते हैं."
बडा विशाल आहाता,अंदर सब सामान सलीके से शेल्फों में सजाकर रखा था.दाल चावल,सब्ज़ियां,फल,सब अपनी अपनी जगह.कास्मेटिक्स के लिए अलग जगह.लगा यह विनिमय का संसार है.मधु ट्राली ले आई और उसमें अपनी ज़रूरत की चीज़ें डालने लगी.जब सब्ज़ियों के पास पहुंचे तो बोली,"देखा मां,कितनी ताज़ी हैं?इनमें खराब सब्ज़ियां बिल्कुल नहीं होतीं.ये खुद उन्हें फेंक देते हैं!"
"सब्ज़ियां पोलीथीन थैलियों में पेक करके रखी हुई थीं.ज़रूरी सब्ज़ियां ले लीं.वहां काम करनेवाले सभी यूनीफार्म में थे.कोई न कोई हमपर नज़र रखे रहता था.मुझे बुरा लगा.मधु से कहा,"अरे,हम क्या चोर उचक्के हैं?ये हमें इस तरह क्यों देखते हैं?"
मधु ने हंसकर कहा,"हम तो नहीं,पर यहां आनेवालों में चोर नहीं होंगे इसकी गारंटी भी तो नहीं ना?कोई छोटी मोटी चीज़ जेब में डालकर चल दिए तो?...पर तुम्हें इससे क्या? जो ज़रूरी है ले लो,फिर घर चलेंगे."
उसकी बातों से मुझे तसल्ली नहीं हुई,अब भी मुझे बुरा लग रहा था.
हम सामान लेकर काउंटर के पास खडे हो गए.चार काउंटर थे और चारों में लंबी लाइनें थीं.हमारी बारी आने में पंद्रह बीस मिनट लगे.काउंटर पर दो जने थे.एक लडकी कंप्यूटर पर बिल बना रही थी और दूसरा चीज़ों को प्लास्टिक की थैलियों में डाल रहा था.पैसे लेते समय मैंने सोचा लडकी हमें देखकर मुस्कुराएगी.पर ऐसा कुछ न हुआ तो मुझे अजीब लगा.हम दोनों थैलियां लेकर बाहर आईं तो मैंने बेटी से कहा,"कम से कम वह लडकी मुस्कुरा तो सकती थी? रोबो की तरह बस काम करती रही!"
"क्या मां तुम भी ना,क्या हम उसके दोस्त या रिश्तेदार हैं जो वह हमें देखकर मुस्कुराती?उनका काम सामान बेचना है और हम खरीदारों के सिवा और कुछ नहीं...बस यह तो व्यापार संबंध है,सिंपल!वह तो ठीक ठाक निभ गया ना?और फिर उसके मुस्कुराने या न मुस्कुराने से हमें क्या फर्क पडता है?"
मैं उन सवालों का जवाब तो नहीं दे सकी.हां उससे हमें कोई फायदा तो नहीं होगा,सच है,पर कोई इस तरह मुस्कुरा दे तो मन खुश हो जाता है.इन्सानों के बीच रह रहे हैं ऐसा अहसास मिलता है जो मन को तसल्ली देता है.एक तरह का भरोसा मिलता है.पर शायद आज की पीढी को यह सब महसूस नहीं होता होगा!
                                                * * *
पिछले तीन हफ्तों से फुड वर्ल्ड से ही सामान खरीद रहे थे.सात आठ बार वहां गए होंगे और हर बार मैं यही उम्मीद लेकर जाती कि कम से कम एक तो ऐसा होगा जो हमें देखकर मुस्कुराएगा. ग्राहक की तरह नहीं,इन्सान की तरह हमारे साथ पेश आएगा.ऐसा लगता है कि यहां इन्सान नहीं मशीनें काम कर रही हैं.सब कुछ बडे ही व्यवस्थित रूप से हो जाता है पर उसमें इन्सानियत का स्पर्श नहीं मिलता.एक तरह का शून्य...उदासी मेरे मन को घेर लेती.
रामुलम्मा,कनकय्या,और मस्तानम्मा बार बार याद आने लगे.तीन हफ्ते हो गए बडी मंडी गए.वे समझ रहे होंगे कि मैं फिर बीमार पड गई.हां,यह भी तो एक बीमारी ही है ना?सूपर मार्केट की बीमारी.पिछले तीन हफ्तों से इस सूपर सिंड्रोम से तो पीडित हूं!अब और सहा नहीं जाता.इसका इलाज तो करना ही पडेगा.
अगले वीरवार को कपडे से बनी थैली लेकर घर से निकलने लगी तो बेटी ने पूछा,"कहां जा रही हो मां?"
"बडी मंडी,सब्ज़ी खरीदने."
"क्यों फुड वर्ल्ड से ले रहे हैं ना? तुमने यह भी कहा कि सब्ज़ियां ताज़ी और अच्छी हैं?"
"मैं इन्सानों से सब्ज़ियां खरीदना चाहती हूं मधू!"
"बगल में इतना बडा सूपर मर्केट है और तुम इतनी दूर सब्ज़ी खरीदने जाओ तो सब समझेंगे तुम पागल हो!"
"हां मधू,मैं पागल हूं! इन्सानों  के साथ बात करना,उनका हालचाल पूछना,दुःख सुख बांटना,यह सब पागलपन नहीं तो और क्या है?"
मैं चप्पल पहनने लगी तो मधु ने कहा,"जाओ,जाओ,बस कुछ ही महीनों की बात है.यहां भी वालमार्ट आनेवाला है.वह कम्पनी हमारे देश भर में चेन स्टोर खोलेगी तो ये मंडी वंडी सब बंद हो जाएंगे.रिलायन्स फ्रेश की दूकानें भी जगह जगह खुलनेवाली हैं.तब सब्ज़ियां खरीदने इन्हीं दूकानों में जाना पडेगा.खरीदना चाहो तो भी मंडी में नहीं खरीद सकोगी!"
मैं सन्न रह गई.अगर सचमुच ऐसा होगा तो मंडी में सब्ज़ी बेचनेवाले गरीब कहां जाएंगे,क्या करके अपना पेट भरेंगे?उनके आंसू जमते जाएंगे और फिर एक दिन फटकर उनकी ज़िंदगियों को डुबो देंगे!मेरा दिल अभी से डूबने लगा.
मंडी में आटो से उतरते ही परिचित चेहरे मुस्कुराते दिखाई दिए.ये बेचारे नहीं जानते कि इनपर कहर बरपा होने वाली है.इनकी इन्सानियत की,दुःख की परवाह करनेवाला कोई नहीं रह जाएगा.सूपर मार्केट इनका सबकुछ निगल जाएगा.
"आज कुछ परेशान दिख रही हो बहन,क्या बात है?तबीयत तो ठीक है ना?"मस्तानम्मा ने आत्मीयता दिखाते हुए पूछा.मुझे मधु का सवाल याद आया,’ये क्या हमारे रिश्तेदार या दोस्त हैं?’मस्तानम्मा मेरी क्या लगती है? बस इन्सानियत का ही तो रिश्ता है!
"हाथी जब चलता है तो उसकी चाल सबको मोह लेती है,पर कोई उन चींटियों के बारे में नहीं सोचता जो उसके पैरों के नीचे कुचलकर मर जाते हैं!"मेरा जवाब सुनकर मस्तानम्मा अचकचा गई.मेरी ओर अजीब नज़रों से देखते हुए बोली,"हम ठहरे अनपढ,तुम्हारी बातें हम क्या समझ सकेंगे?"फिर अपनी खूबसूरत हंसी बिखेर दी.
मैं सोचने लगी,क्या यह हंसी हमेशा केलिए बरकरार रहेगी?
फिर मैंने ज़रूरत की सब्ज़ियां खरीद लीं.थैली भर गई.सब्ज़ियों के साथ शायद मंडी से उन सबके दुःख,आंसू और तक्लीफें भी थैली में भरकर लाई थी,इस बार थैली हमेशा से ज़्याद भारी लगी.



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(२०१२ अक्तूबर - नवंबर अंक ’कथन’ पत्रिका में प्रकाशित.)


Wednesday, November 14, 2012


अभी बहुत कुछ बदलने को है                                      मूल तेलुगु कहानी :रमणजीवि
                                                                      अनुवाद : आर.शांता सुंदरी
                                                                      ---------------------------
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 अगस्त २०७८
शाम के पांच बजनेवाले थे.
अबीद्स रोड.आठ साल का बच्चा स्केटिंग कर रहा था.एक फर्लांग दूर से आती साइकिलों की आवाज़ सुनकर पीछे मुडकर एक बार देखा और फिर अपने खेल में मगन हो गया.सडक के बीचों बीच दो गाएं और एक भैंस आराम से बैठे जुगाली कर रही थीं.

"मुझे यकीन नहीं होता कि यह अबीद्स है.लगता है संपूर्ण सूर्यग्रहण,या कर्फ्यू लगा है,"साइकिल को खडी करते हुए एक बीस साल की युवती ने कहा.उसका नाम नीता है.सफेद चूडीदार में उसका बदन बहुत ही कमज़ोर दिख रहा था.उस सडक को देखने के बाद वह अपने मां बाप का अता पता न मालूम होने का दुःख भी भूल गई.

इतनी गाडियां कि तिल रखने की भी जगह नहीं रहती थी यहां.हर तरफ धुआं,जलने की बू,दिल दहलानेवाली आवाज़ों से भरी रहती थी वह जगह.पर अब...!

साथ आई नर्स हंस पडी,"तुम चार साल कोमा में रही.अब अचानक देखने से ऐसा लग रहा है.वरना हमें तो इनकी आदत हो गई है."

’किनकी?’नीता ने आंखों में इस सवाल के साथ नर्स को देखा.

मल्टी स्टोरीड बिल्डिंगें,बडी बडी दुकानें सब बंद हो गईं.उनपर धूल जम चुकी थी.ग्लोसाइन बोर्डों का भी यही हाल था.न जाने कबसे उनका जगमगाना बंद हो गया था!दूर की सिर्फ दो दुकानें खुली थीं और साफ सुथरी नज़र आ रही थीं.बाहर तीन साइकिलें खडी थीं.नीता ने अंदाज़ा लगाया कि अंदर कुछ खरीदार होंगे.

"अरे,इन्सान सब कहां चले गए?...सिर्फ गाडियां..."नीता ने हैरान होकर पूछा.यह देखकर नर्स फूली नहीं समा रही थी.जैसे ये सब करतब उसी का हो!

"कुछ और बातें सुनोगी तो तेरे होश उड जाएंगे!अब इस दुनिया में एक भी मोटर गाडी या हवाई जहाज़ नहीं है...जानती हो?सबको तोडफोड दिया गया.स्क्रेप...सफाचट...!"नर्स ने हाथों के इशारा करते हुए कहा.

नीता को चुप देखकर नर्स ने फिर पूछा,"अच्छा यह बताना अब दुनिया में कितनी आबादी है?"

नीता की आंखें मुंद गईं.पर उसने फिर भी जवाब में कुछ भी नहीं कहा.

"सिर्फ छः करोड से कुछ ऊपर.हैदराबाद में बत्तीस हज़ार.केन यू बिलीव?"उसने रंग बदलते नीता के चेहरे की ओर चमकती आंखों से देखते हुए कहा

"ओह...!" कहकर नीता जल्दी से एक दूकान की सीढियों पर जाकर बैठ गई.नर्स ने भी उसके बगल में बैठकर नीता के कंधे पर हाथ डाला.

"जानती हो अब पैसे नाम की चीज़ भी नहीं रही.सबको हर रोज़ तीन घंटे काम करना पडता है.आज अस्पताल में तो कल जूतों की दुकान में....परसों कपडों की दुकान में...फिर खेतों में...अब मज़हब भी खतम हो गए.देश अलग अलग नहीं हैं...सरकारें भी नहीं हैं...सिर्फ लोग हैं...बस...’जिन बातों को समझाने में कुछ रोज़ लग जाते,नर्स उन्हें पलों में बता देने की कोशिश कर रही थी.

नीता को लगा, नर्स मुझे बुद्धू बना रही है,या यह सब एक सपना है.

"चलो वह सब छोडो और यह बताओ कि असल में हुआ क्या था?...प्लीज़!"

"चार साल पहले की बात है.नवंबर की सातवीं तारीख को..."

             *                                               *                                                    *

नवंबर सात तारीख,२०७४

योगी अपने फार्म हाउस के बाहर आराम कुर्सी पर बैठा था.उसकी उम्र चालीस से ऊपर थी.सूती कमीज़ जीन्स पहने छरहरा बदन था उसका.उसकी आंखें खुली तो थीं पर नज़रें कहीं टिकी नहीं थीं.पीछे के बालों को रह रहकर खींचते हुए किसी सोच में डूबा था वह.

फिर उठकर थोडी दूर पर चारे के लिए बेचैन  खरगोशों के पास गया और उनके सामने घास और सब्ज़ी के टुकडों से भरी टोकरी उंडेल दी.उन्हें प्यार से निहारते हुए उनपर हाथ फेरने लगा.थोडी दूर घास चरते हिरनों की ओर और सूखे पेड की डाली पर बैठे चिंपांज़ी की ओर देखता रहा.

अपने अहाते में निर्मित जलाशय के पास जाकर,मगरमच्छों को देखा.उनमें एक डोरी नाम की मादा मगरमच्छ अंडे देने वाली थी.

हाथ जीन्स की जेब में घुसाकर चारों ओर उसने नज़र दौडाई,ऊंची चारदीवारी के बाहर हवा में हल्के से झूमते लंबे पेड थे.उन पेडों पर बैठी चिडियां मीठी आवाज़ में गा रही थीं.शाम का वक्त था.

योगी की आंखों में उन सबसे अल्विदा कहने का भाव था!

एक बार पीछे के बालों को ज़ोर से खींचकर उसने गेट पूरा खोल दिया.अहाते में से सभी जानवरों को बाहर भगा देने के बाद जलाशय का गेट खोला.तेज़ी से हमला करनेवाले मगरमच्छों से खुद को बचाने के लिए उछलकर दूर गया हो और उन्हें भी चालाकी से बाहर भागा दिया.उसके बाद फार्म हाउस में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया.प्यार से पाले सारे जान्वरों को खुले संसार में छोडकर,अंदर ज़मीन पर एक खुफिया दरवाज़ा खोला और नीचे उतर गया.

सेल्लार में एक बडी मशीन थी जो रस्सियों में बंधे हाथी जैसी दिखाई दे रही थी.उस पर बेतरतीबी से फैले थे कुछ तार और पाइप.चौबीसों घंटे बैकप के सहारे काम करनेवाला जायंट कंप्यूटर था वह.

सभी सिस्टम्स में काम चल रहा था.योगि ने एक बार हाथ की घडी की ओर देखा और एक कोने में रखी फ्लास्क से गरमागरम काफी मग में भरकर,रिवाल्विंग चैर पर बैठ गया.मेज़ पर रखी सिस्टम में ’सेवियर’शीर्षक वीडियो फाइल उसने खोला.तुरंत मानिटर के परदे पर योगी प्रकट हुआ.

’गुड मार्निंग फ्रेंड्स!मेरे नाम से न आपको कुछ लेना देना है न मुझे.क्यों कि हमें अलग करने वाली बातों में नाम भी एक है.

"मैं एक पर्यावरणविद हूं ,प्रकृति से प्रेम करता हूं.मतलब,जंगल,समंदर,आकाश,जानवर,आप,मैं, सब मुझे प्यारे हैं.लेकिन इन सबका विनाश करने की दिशा में मानव अग्रसर हो रहा है.इसलिए अब मैं जो कर रहा हूं वह अनिवार्य है,इसे आप समझ लें.

"वैसे मैं जो  करने जा रहा हूं,वह इस धरती पर संख्या को ठीक करने का काम है.यानी, इस भूमि पर कितने कौव्वे हों,शेर हों,इन्सान हों,यह सब पहले से तय है.जब एक प्रजाति के पक्षियों की तादाद बढ जाती है तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं.उनमें जो ज़िम्मेदारी या विवेक है,वह इन्सान में नहीं है.इसीलिए उसकी ज़िंदगी इतने सम्घर्षों से,इतने असंतोष से भर गया है.जानवर बाल्यावस्था में जितने खुश रहते हैं,बडे होने के बाद भी उतना ही खुश रहते हैं.इन्सानों के विषय में यह पूरी तरह भिन्न है.बढना इतना दुर्भाग्य कैसे माना जाने लगा?क्यों ऐसा हो रहा है?

"विरोधों से भरे नियम ही इसका कारण है.जिन लोगों ने नियम बनाए,उन्हीं को उनका उल्लंघन करने में मज़ा आता है,यह उससे भी बडा विषाद है.इसी क्रम में श्रम के प्रतीक रूप में पैसा नामक ज़हरीले पदार्थ की भी सृष्टि करनी पडी.मानव के प्रस्थान में यह एक अत्यंत विनाशकारी कदम रहा.

"पैसा ऐसा भयंकर ज़हर है कि इन्सान के सहज स्वभाव, आनंद,सृजन शक्ति,सबको मटियामेट कर देता है.संसार की ऐसी अधोगति हो गई है कि पैसा न कमानेवाला हरेक क्षण व्यर्थ समझा जाने लगा.यह तकनीकी युग तो उस सोच की पराकाष्ठा है.इन्सानों की संख्या ठीक करने से बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा.

"पर ज़रूरी नहीं कि यह आपरेशन सफल ही हो.क्यों कि सब ज़रूरी जांच मैं नहीं कर पाया.वजह,यह इन्सानों की मौत पर किया जानेवाला प्रयोग है!ज़्यादातर यह मेरी कल्पनाशक्ति पर ही आधारित है.अगर मैं असफल हो जाऊं,तो भी, अगर किसीको लगे कि मेरे विचार सही हैं,तो इस प्रयोग को आगे ले जाएं...इस पृथ्वी को बचाएं...

"क्यों कि जैसे ही यह आपरेशन पूरा हो जाएगा,इस प्रयोगशाला के साथ मैं भी तहसनहस हो जाऊंगा.मैं जिस नये संसार की सृष्टि करनेवाला हूं उसमें मैं भी न रहूं,इसके लिए मैंने खुद को तैयार करने की ज़रूरत समझी थी..."

इतने में दूर रखे मास्टर कंप्यूटर में से अलर्ट आने लगे.योगी उसके पास जाकर कमांड देने लगा.बीच बीच में मग में से काफी भी पीने लगा.

’सेवियर’,ये बडे अक्षर परदे पर प्रकट हुए.
योगी ने ज़ोर से सांस ली और मग मेज़ पर रख दिया.उसने जो वाइरस तैयार की,उसका नाम रखा सेवियर.जिस दिन वह वाइरस बनी,योगी को नहीं मालूम हुआ कि उससे वह खुश हो या दुखी.

सेवियर सेलफोन के तरंगों के साथ कहीं भी जा सकती थी.फोन उठाते ही उधर के आदमी के साथ आधे किलोमीटर के घेरे के अंदर जो भी होगा,सर्वर ब्रेकडाउन होने से,पूरा का पूरा  पलभर में नष्ट हो जाएगा.उसके बाद कुछ ही पलों में वाइरस भी अपनी शक्ति खो देगा ताकि बाकियों का कोई नुकसान न हो.

समूचे संसार से सेलफोन नंबर इकट्ठे करने में उसका पेशा उसके काम आया.संसार के कोने कोने में यह आपरेशन चलाया जाएगा.उपग्रह केंद्रों में,परमाणु केंद्रों में,एंटी बयाटिक्स,गैस बेसिन्स जैसी संस्थाओं में मुख्य कार्यों पर लगे वैज्ञानिकों को,सामाजिक कार्यकर्ताओं को,इस आपरेशन से योगी ने अलग रखा ताकि उनकी मृत्यु न हो.उन वाइरसों को हटाने,बेकार करने और नए समाज का निर्माण करने केलिए उनका जीवित रहना ज़रूरी था.

वैसे योगी ने इस वाइरस को दस साल पहले बनाया था.तब सारा संसार दो देशों में विभक्त होकर तीसरे विश्वयुद्ध की तैयारी में लगा था.संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी जवाब दे दिया था.

हम ना रहें तो कोई बात नहीं,पर दूसरे को मिटाकर ही रहेंगे,यही दुनिया की सोच हो गई.

इस युद्ध से किसी प्रकार जुडे न रहने वाले करोडों लोग विरोध कर बैठे."आप कौन होते हैं युद्ध करनेवाले?अगर इतना ही शौक है तो द्वन्द्व युद्ध करो!’यही सोचकर जब सेना भी बगावत कर बैठी ,तब जाकर चर्बी चढे सांड जैसे नेता लोगों ने घुटने टेक दिए.

युद्ध रुक जाने से योगी भी रुक गया.

पर वह खुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकी.चांद पर कालोनी बनाने की कोशिशें जब ज़ोर पकडने लगीं,तब दोबारा योगी ने सेवियर को याद किया.

इन्सान और कितने ग्रहों में विनाश की सृष्टि करेगा?इस अन्याय को रोकना पडेगा!इसके विकृत प्यास पर चेक लगाना ज़रूरी है.

क्या यह सचमुच आगे बढना ही है?पीछे जब इतनी भूख और दुःख है...इन्सान को देने केलिए गालियां भी नहीं बची!

कई दिन सोचने के बाद उस रोज़ दोपहर को वह एक पक्का निश्चय कर सका.सेवियर का प्रयोग करना ही होगा!

सेवियर मशीन गरम होने लगा.योगी ने उसको छुआ...गर्मी नापी और हाथ की घडी की ओर देखा.दोपहर दो बजे वाइरस प्रक्रिया शुरू हुई.उस पूरी प्रक्रिया को खतम होने में छः घंटे और पैंतीस सेकंड लगेंगे.

योगी रिवाल्विंग कुर्सी पर बैठकर अपना वीडियो देखने लगा.फिर उसने संदेश देना शुरू किया...

"इन्सान अगर चांद पर कालोनियां बनाने लगेगा तो जानते हैं क्या होगा?मैं समाज शास्त्री नहीं हूं जीवशास्त्र का वैज्ञानिक हूं.फिर भी कल्पना कर सकता हूं.होगा यह कि...पैसेवाले सब चांद पर प्रवास कर जाएंगे.वैसे जाएंगे तो कोई बात नहीं,इस धरती को एक खंडहर बनाकर जाएंगे.आगे चलकर यह धरती एक प्रयोगशाला का रूप ले लेगी तो भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.यहां जो लोग रह जाते हैं,उन्हें इन्सान की पहचान भी नहीं मिलेगी.यह दौर वैसे अभी शुरू हो चुका है.

"और एक बात...

अपार जलराशियों से,अनन्य वनों से,अद्भुत वातावरण से शोभायमान इस धरती को नष्टभ्रष्ट करनेवाले केलिए चांद को मिटाने में कितना वक्त लगेगा?सच पूछिए तो जब यह इस धरती को पूर्व रूप देने का काम करेगा तभी दूसरे ग्रहों पर उडकर जाने की योग्यता पा सकेगा.

"यह इस प्रकार अति उत्साह से हत्या और आत्महत्या करने लगेगा तो मैं चुप नहीं रहूंगा.एक पर्यावरणविद होने के नाते..."

इतने में ज़ोर से अलार्म बजी.योगी चौंक उठा.घडी की ओर देखा.सबकुछ समय के मुताबिक हो रहा था,एक सेकंड का भी फर्क नहीं आया.अपने प्रयोग की सफलता के ही आसार दिखाई दे रहे थे उसे.उसका दिल और ज़ोर से धडकने लगा!

उसने वीडियो फाइल बंद किया और वहां से उठा.हेल्मेट जैसी चीज़ पहनकर प्रोसेस्सिंग मशीन के लीवर को लाल बत्ती के जलने तक ऊपर नीचे पंप किया.ऐसा करते वक्त उसके हाथों में हल्का सा सिहरन उठ रहा था.उसने सोचा, मेरे हाथ की एक एक हरकत मनुष्य की नस्ल को मौत की तरफ एक एक कदम ले जाएगी!

लाल बत्ती जल उठी!प्रयोगशाला में लाल रोशनी भर गई.योगी को लगा कि वह रोशनी ज़बर्दस्ती अंदर घुस आनेवाली शाम की निस्तेज रोशनी जैसी है.

’सेवियर रेडी’,ये अक्षर जलते बुझते दिखाई देने लगे.’लोड काल्स’,टाइप करके कुर्सी पर वह आराम से बैठ गया और आंखें मूंद लीं.अपने मन को काबू में करने का वह भरसक कोशिश कर रहा था, फिर भी वह उद्वेलित होने लगा.

सिस्टम में जो बाक्स था, उसमें लाल रंग भरने लगा.यानी, लाखों फोन नंबर डायलिंग के लिए तैयार होने लगे हैं.उनमें योगी,उसकी पत्नी और बेटे के नंबर भी हैं.अगर कोई फोन नहीं उठाए या फोन एंगेज रहे तो नंबर एक घंटे तक रीडायल होते रहेंगे.

"रेडी टु काल!"एक मोटी आवाज़ मानिटर में से आई और योगी ने चौंककर आंखें खोल दीं.मानिटर पर लाल अक्षरों में’काल’लिखा था.

एंटर दबाने से सैकडों करोडों इन्सान कुछ ही पलों में इस दुनिया से उठ जाएंगे.यानी कई शरीरों में मनुष्य जीना छोड देगा.बस! मनुष्य रहेगा...प्राचीन मनुष्य!मैं सिर्फ उसे एडिट कर रहा हूं! योगी बुदबुदाया.

एंटर बटन पर उसकी पतली उंगली गई.अंगूठा कांप रहा था.उसके मन में आखिरी बार बिना चेहरेवाले करोडों इन्सान दिखाई दिए...बस एक पल के लिए!

लंबी सांस भरकर उसने ज़ोर से एंटर का बटन दबाया.

अगले पल मेज़ पर रखा सेलफोन बज उठा.योगी ने उसे उठाया.रिसीविंग बटन दबाते हुए वह बेचैन और परेशान हो गया.अपना प्रयोग सफल होगा या नहीं इस बात की चिंता थी उसे...एक कलाकार की बेचैनी...उसने हेलो कहा...

हाइ वोल्टेज बिजली का झटका लगने से जैसे कांप जाते हैं,वैसे ही योगी का समस्त शरीर कांप उठा.उस स्थिति में भी अपने प्रयोग की कामयाबी से योगी के होंठों पर खुशी खिल गई...बस आधे पल के लिए...तुरंत वह कुर्सी से उछलकर नीचे अचेत होकर गिर पडा.

एक घंटे बाद वह प्रयोगशाला धमाके के साथ फट पडी.इस तरह  दुनिया को बचाने केलिए दुनिया छोड गया नोबेल पुरस्कार को अस्वीकार करनेवाला प्रसिद्ध पर्यावरणविद,योगी!

"वह जो भी था,मगर सच्चा प्रेमी था...इस दुनिया से उसे सच्चा प्यार था."ज़मीन की ओर देखते हुए कहा नीता ने.फिर ऊपर आसमान को देखकर सोचा,’नए अक्षर उडने को हैं!’

नर्स ने एक साइकिल वहीं छोड दी और नीता को अपनी साइकिल के बार पर बिठा लिया.नीता बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी."चलो तुम्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाती हूं!"नर्स साइकिल चलाते हुए बोली.नीता चारों ओर नज़र दौडाकर गौर से देखने लगी...कहीं कोई इन्सान नहीं दिखाई दे रहा था...बस कुछ कुत्ते और गाएं थीं.

एक बडे किले के आगे नर्स ने साइकिल रोकी.उस किले की दीवार का ओर छोर नहीं था,दिगंतों तक दीवार चली जा रही थी.

"यह हमारी कालोनी का बार्डर है," नर्स ने कहा.दोनों दीवार के पास जाकर उसमें लगी जालीदार खिडकी से अंदर झांका.दीवार के उस पार एक खंदक था.उसके आगे टूटे फूटे मकानों के बीच एक जंगल शुरू हो रहा था.शेर और हिरन एक ही खंदक से पानी पी रहे थे.

नीता ने हैरान होकर नर्स की ओर देखा.

"लगता है उस शेर ने अभी अभी पेट भरके खा लिया,बस! हिरन जानते हैं कि कब उन्हें शेर से खतरा है.शेर ज़्यादातर हिरन जैसा ही होता है.सिर्फ इन्सान है जो चौबीसों घंटे शेर बना रहता है!"

नीता ने नर्स की बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.

"क्या यह चिडिया घर है?"नीता ने पूछा.नर्स नीता के बाल बिखेरते हुए हंसी और बोली,"नहीं बच्चे...यह जंगल है.हमारी कालोनी के चारों ओर का जंगल.सिर्फ इस तरफ की दीवार के यह इतने पास है.बाकी तीनों तरफ से जाना हो तो सैकडों किलोमीटर फार्म हाउज़ेस को पार करने के बाद ही जंगल तक पहुंचा जा सकता है.जानवरों को देखने केलिए इस तरफ इस दीवार को यहां खडा किया है.इस खंदक को खोदने में और दीवार बनाने में मेरा भी पसीना मिला हुआ है,जानती हो?बीस हज़ार लोगों ने काम किया तो एक साल में इसे बना पाए!"

नीता शेर और हिरनों को देखने लगी.

"अब इन्सान और जानवर अपनी ज़िंदगी अलग अलग रहकर जीते हैं .एक दूसरे के मामले में टांग नहीं अडा सकते.प्राकृतिक चुनाव को इन्सान नें ही खराब करके रख दिया था.फिर एक इन्सान ने ही...सिर्फ एक इन्सान ने...उसे ठीक कर दिया!"

"तो क्या संसार में हर जगह ऐसी ही कालोनियां हैं?"

"पता नहीं,योगी ने जो वीडियो में बताया ,उसके आधार पर सब यही मानते हैं,पर इन कालोनियों में किसी का किसीसे भी संबंध नहीं हैं.योगी के प्रयोग की वजह से सारे सेल टावर खराब हो गए.शायद योगी खुद नहीं जानता था इस तरह कुछ होगा.टीवी चेनेल काम नहीं करते.शायद सेटिलाइट्स को इनेक्टिव कर दिया हो?असल में कोई भी इस तरह का संबंध रखना ही नहीं चाहता.संबंध रखना हो तो जंगलों और समंदरों में रास्ते बनाने होंगे.मतलब,उन्हें चोट पहुंचाना होगा."

"जंगलों,रेगिस्तानों और समंदरों को अबतक जो पार करते रहे वह काफी है.अब वे सब हमें रोमांच नहीं पहुंचाते.किसी को ये काम करने की रुचि या ज़रूरत नहीं रही.यह जो ज़िंदगी हम जी रहे हैं,वही अच्छी है,है ना?"रिवाल्विंग कुर्सी पर गोल गोल घूमते हुए नर्स ने कहा.

नीता को नर्स की बत ठीक लगी और वे शब्द उसके मन में बहुत देर तक गूंजते रहे.

नर्स ने उठकर डीवीडी चालू किया.टीवी के परदे पर योगी प्रकट हुआ.दाढी करीने से ट्रिम किए था वह.उसकी आंखों में चमक के साथ हल्की सी नमी भी दिखाई दी.उसके चेहरे पर प्यार का भाव था.उसकी आवाज़ साफ थी और कानों को भली लग रही थी.सुननेवाले को एक दम आकर्षित कर लेनेवाला व्यक्तित्व था उसका.

..."अब आप जिस ज़मीन पर चल फिर रहे हैं.इसका एक एक इंच कई लोगों के खाली करके चले जाने से ही आपको मिला है.यह आप अच्छी तरह याद रख लें..."

योगी का भाषण चल ही रहा था,इतने में नर्स ने गलती से रिमोट का बटन दबा दिया.परदे पर से योगी गायब हो गया और लोकल फिज़िकल कनेक्टिविटी से काम करनेवाला दूसरा चेनल चल पडा.

उसमें खबरें पढी जा रही थीं...

’इस नई दुनिया में सबसे पहला अपराध...अपने प्रेम को ठुकरानेवाली चौदह साल की लडकी का गला ब्लेड से काटनेवाला युवक...’

नीता ने लंबी सांस छोडकर सोचा...अभी इस दुनिया में बहुत कुछ बदलने की ज़रूरत है!

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Sunday, October 23, 2011

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आँखों की आभा जा बसी नीलकमलों में*: वरवर राव

वरवर राव

छत्तीसगढ़ में 5 जुलाई को एक आदिवासी लड़की को चंदो नामक गाँव के पास एनकाउंटर में मारा गया था। इसको लेकर लिखा तेलुगु के जनकवि वरवर राव का लेख दैनिक ‘आंध्राज्योती’ में प्रकाशित हुआ। तेलुगु से हिन्‍दी में इसका अनुवाद आर. शांता सुंदरी ने किया है-

घने जंगल में अपने घर के चारों ओर छाए नीरव निश्शब्द में चहकते हुए हालचाल पूछनेवाले परिंदों को तरह-तरह के नाम देना मीना खल्को को पसन्द था। न जाने कितने अनगिनत घण्टे वह इसी तरह गुज़ार देती थी। कभी-कभार दिख पड़ने वाले जानवरों को भी वह इसी तरह नाम दे देती थी।

वह सोलह साल की थी। उसने पाँचवीं तक पढा़ई करके पाठशाला जाना बन्द कर दिया। जंगल में मवेशियों के साथ घूमने की इच्छा से पढ़ाई छोड़ दी थी उसने। उरान आदिवासी जाति के बुद्धेश्‍वेरी खल्को और गुतियारी के दो लडकियां थीं। मीना बड़ी थी और चौदह साल की सजंति छोटी थी। उनके पास पाँच बकरियाँ थीं। उन्हीं के सहारे उस परिवार का गुजारा चलता था। मीना माँ के साथ बकरियाँ चराते दिनभर जंगल में घूमती रहती थी। घर पर रहती तो भी सारा वक्त पशु-पक्षियों के संग ही बिताती थी। उसने अपनी पाँचों बकरियों के नाम भी रखे- सुखिनि, सुक्ता, सुराइला, भूट्नी और लधगुड्नी।

मीना के घर का आसपास बड़ा सुन्दर था, बस उनकी झोपड़ी ही जर्जर थी। घर के पास ही एक तालाब था। तालाब के किनारे पहाड़ थे। हरीभरी घास के मैदान पेडों की कतार जैसे एक-दूसरे के हाथ पकड़े खडे़ हों। झारखण्ड के जंगलों को छत्तीसगढ़ से जोड़ते से चुनचुना पहाड़, उन पहाड़ों से कूदते झरने।

बिजली की बात छोडि़ये वहां अबतक आधुनिकता का पदार्पण ही नहीं हुआ। जुलाई 5 तारीख को मीना अपनी सहेली से मिलने जंगल में गई। कर्चा से दो-तीन किलोमिटर दूर स्थित चंदो नामक गाँव के पास वह एक एनकांउटर में फंस गई।

‘‘तड़के तीन बजे के करीब हमने तीन बार गोलियाँ चलने की आवा़ज सुनी। डर के मारे घर से बाहर नहीं निकले। छः बजे जाकर देखा तो बाहर पुलिस वाले दिखाई दिये।’’ एनकांउटर जहाँ किया गया था, उसके सामनेवाले घर में रहनेवाली विमला भगत ने बताया। पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी कि उस घटना के बारे में किसी से भी कुछ न कहें। चंदो और बलरामपुर के पुलिसवाले यह नहीं मान रहे हैं कि सिर्फ तीन बार गोलियों की आवाज सुनाई दी, पर उससे ज़्यादा गोलियाँ चलने के निशान वहाँ नहीं मिले। ‘एनकाउंटर कहां हुआ था? किसी भी एनकाउंटर में दोनों तरफ से कम से कम पचास-साठ राउंड चलते हैं। यहाँ सिर्फ तीन गोलियाँ चलाई गईं। उनमें से दो मीना के शरीर के पार हो गईं।’ ये बातें सिर्फ चंदो गांव के सरपंच ही नहीं, वहाँ के लोग भी कह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री नानकीराम कंवर का कहना है कि मीना का इतनी रात गए जंगल में दिखाई देना ही यह सिद्ध करता है कि उसके माओवादियों से सम्बन्ध बने हुए हैं। वह एक घना बीहड जंगल है इसलिए वहाँ माओवादियों के होने की बात कही जा रही है। लेकिन पुलिस इस बात का सबूत पेश नहीं कर पा रही है कि वहाँ सचमुच माओवादी गुट छुपे हैं। अधिकारिक घोषणा के अनुसार एनकाउंटर तड़के तीन बजे हुआ था। कुछ घण्टे बाद मीना का घायल शरीर वहाँ पड़ा मिला। बलरामपुर का एस.पी. जितेन्द्र का कहना है कि बाकी नक्सलवादी भाग गए होंगे। उसका कहना है, ‘एनकाउंटर रात के अन्धेरे में किया गया था। पुलिसवालों ने सुबह छः बजे तलाशना शुरू किया, तब वह घायल स्थिति में उन्हें वहाँ दिखाई दी। उसने अपने कुछ नक्सलाइट साथियों के नाम भी बताए।’

एनकाउंटर जहाँ हुआ था उस जगह से चंदों पुलिस स्टेशन चार किलोमीटर दूर है। वह खुली जगह है जहाँ किसी तरह की ओट नहीं है।

‘‘नक्सलियों के साथ किसी के सम्‍बन्‍ध हों तो पडोसियों को ही नहीं दूर के रिश्तेदारों तक को पता चल जाता है। वह लड़की नक्सलवादी नहीं थी।’’ अयिकुराम ने कहा। वह कर्चा से बीस किलोमीटर दूर स्थित एक सरकारी पाठशाला में अध्यापक है।

इस एनकाउंटर के विरुद्ध सरगुजा के आसपास उमडे़ आन्‍दोलन के आगे छत्तीसगढ़ की सरकार को घुटने टेकने ही पडे़ । उसने मजिस्टीरियल जाँच कराने का आदेश दिया (छत्तीसगढ़ में एनकाउंटरों पर मजिस्टीरियल तहकीकत नहीं होती। कई बार पोस्टमार्टम भी नही होता। लाश को रिश्तेदारों के हवाले भी नहीं किया जाता)। केस सीआइडी को सौंप दिया गया। चंदों पुलिस स्टेशन के सभी पुलिस अधिकारियों को अंबिकापुर पुलिस लाइन्स में भेज दिया गया। मीना के परिवारवालों को दो लाख रुपये हर्जाना दिया गया। इस एनकाउंटर से किसी तरह का नाता न होने पर भी उसी वक्त मीना के भाई रवीन्द्र खल्को की चंदो बालिका हॉस्टल में नौकरी लग गई। पुलिस परोक्ष रूप से इसे झूठा एनकाउंटर स्वीकार कर चुकी है। यह सिद्ध करने के लिए चंदो के सरपंच ने कहा, ‘‘क्या आपने कभी नक्सलियों के भाइयों को सरकारी नौकरी मिलने की बात सुनी है।’’ जि़ला कलक्टर जी.एस. धनुंजय ने कहा, ‘‘यह नौकरी मुख्यमंत्री रमण सिंह के कहने पर ही दी गई थी। वे (खल्को जनजाति) आदिवासियों में सबसे गरीब हैं। इन्सानियत के नाते उस लडके को नौकरी दी हमने। हॉस्टल में चपरासी की जरूरत थी। योग्यता न होने के बावजूद दिहाडी पर उसे नौकरी दी। वह दसवीं पास कर लेगा तो स्थाई नौकरी मिल जाएगी। फिलहाल उसे चार हज़ार रुपये मिल रहे हैं।’’

अगर मीना के एनकाउंटर के बाद अपनी गलती सुधारने की बात पर यह किस्सा यहीं खतम हो जाती तो यह पूरी कहानी नहीं बनती। और न ही हमारे ‘हिन्‍दू’ देश में पुरुषों के नजरिये को समझने में इससे मदद मिल सकती। कहीं इस पुरुष स्वभाव को अपनी गलती मानना खल रहा था। अपमान की भावना जाग रही थी। राज्‍य सरकार, वह भी बी.जे.पी. सरकार को छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के विद्रोह को कुचल देने के लिए विपक्ष कांग्रेस और केन्द्र में कांग्रेस सरकार का समर्थन हमेशा से मिलता रहा है। केन्द्र आर्थिक और फौजी सहायता भी पहुँचा रहा है। जंगल में पूरे रूप से नक्सलियों का प्रभाव है, यह बात सारा संसार जानता है। वहाँ आदिवासी रहते हैं…अत्‍यंत निर्धन आदिवासी जनजातियाँ रहती हैं। और मीना ठहरी अति निर्धन आदिवासी जनजाति की लड़की। कितने ही तरह के अधिकार एक तरफ और कुचले जाने की कई योग्यताओं से युक्‍त एक अनाम लडकी एक तरफ। माओ ने जिन्हें चौथे जुआ का बोझ ढोने लायक कहा था, वह शायद इस तरह की स्त्री ही हों। और फिर यह तो और भी भोज डाले जाने लायक आदिवासी स्त्री थी। स्त्री भी नहीं, कुँवारी लडकी थी।

न जाने क्यों मुझे एक बारगी ‘पाथेर पांचाली’ फिल्म की दुर्गा और ‘समाप्ति’ फिल्म की मृणालिनी याद आ गई। मृणालिनी इसलिए कि उसमें भी प्रकृति के प्रति प्रेम भरा था। दुर्गा में भी यह बात थी। उसके लिए रेल एक अजूबा था। उसमें इस कदर भोलापन था कि अमीरों के आडम्‍बर और गहने-लत्‍ते देखकर अविश्वास से आँखें कमल की पंखुडियों की तरह फैल जातीं। समाज में असमानता इन्सानों पर क्या प्रभाव डालती है? दोनों पक्षों के इन्सानों को इन्सान न समझना सिखाती है। अमीरों के पास सबकुछ है। न्याय, नीति, पवित्रता, अधिकार…। अभावग्रस्त लोग चोर हैं, अपराधी हैं, पतित हैं, भ्रष्ट हैं। ये मापदण्ड कौन तय करता है? अमीर ही। जिनके पास शिक्षा है, जिनके पास अधिकार नहीं है, उनसे अधिकार प्राप्त करके वे अभावग्रस्तों के लिए एक अपराध से भरे संसार की सृष्टि करनेवाली दण्‍ड संहिता की रचना करते हैं।

मीना के एनकाउंटर होने के दो महीने बाद गृह मंत्री नानकीराम कंवर ने कहा, ‘‘मीना व्यभिचारिणी थी। ट्रक ड्राइवरों के साथ उसके नाजायज संबंध थे।’’ एनकाउंटर हुआ तब वह घर से दूर थी इसका कारण नक्सलियों से उसका संबंध है। इस बात की पुष्टि होती है, यह ज्ञान भी उस पुरुष सत्तात्मक पुलिस मंत्री के दिमाग में कौंध उठा। कुछ पुलिसवालों को भी यह विश्वास करने योग्य अभियोग लगा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ‘मूत्र नली में छेद हो गए, गर्भाशय का ऊपरी भाग चिर गया’, इस तरह के लैंगिक अत्याचार को सूचित करनेवाली बातें जोडी़ गईं। एक अधिकारी का कहना था कि चंदो पुलिस स्टेशन से पूरी टुकडी को दूसरी जगह बदलने के बाद इस तरह की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश करना बडी़ हैरानी की बात है। ‘रिपोर्ट में सिर्फ घावों के बारे में और मौत की वजह के बारे में लिखा जाना चाहिए था’, यह उसका कहना था। गाँव वालों का कहना था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मीना के शराबी होने की बात बाद में जोड़ दी होगी।

बलरामपुर के एस.पी. ने कहा कि मीना की योनि के अंश फोरेन्सिक लेब में भेजे गए हैं और नतीजे आने अभी बाकी हैं। लेकिन गृह मंत्री ने फैसला सुना दिया कि मीना बदचलन थी। सरपंच ने दुःख व्यक्त किया कि भले ही सभी गाँववाले खल्को परिवार का साथ दे रहे हों, फिर भी यह दाग उस परिवार का जीना दूभर कर देगा। क्या मीना नक्सल थी? बदचलन थी? उसकी मौत का राज़ उसके दोस्त जंगल के दिल को मालूम था। ‘‘उसपर पहले उन्होंने (पुलिस) अत्याचार किया। फिर उसे मार डाला। पहले मेरी बच्ची को उन लोगों ने नक्सल कहा। अब कहते हैं कि वह बदचलन थी। यही आरोप मुझे सबसे ज़्यादा दुःख पहुँचा रहा है’’, मौन तोड़कर बडी़ वेदना से भरी मीना की माँ बुद्धेश्वरी देवी कह रही हैं। मीना की छोटी बहन सजंति सोलह साल की अपनी बहन की पासपोर्ट साइज तसवीर हमेशा अपने पास रखती है और जो भी मिलने आता उसे दिखाती रहती है।

जुलाई छः तारीख को मीना की लाश को कन्हर नदी तट पर दफनाने के बाद उसका नेलपालिश, हेयरक्लिप, फ्राॅक और किताबों से भरी उसकी छोटी-सी संदूकची को उसके परिवार ने उसी नदी में बहा दिया। दुर्गा के (चोरी करके) छिपाये कण्‍ठहार को आँसू बहाते हुए जिस तरह अपू ने तालाब के पानी में छोड़ दिया था, उसी तरह इस बोझ को ढोनेवाली व्यवस्था से सजंति और उसके माँ-बाप कब मुक्त होंगे?

*तेलुगु के महाकवि गुरजाड अप्पाराव की कविता की एक पंक्ति
-Translated by R.Santha Sundari

Thursday, October 6, 2011

गुमशुदा
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वहां कोई भी आराम और चैन से नहीं रहता
चढनेवाले,उतरनेवाले,राह देखनेवाले
बहुत शोर रहता है
वहां खडा दिखाई देता है बस स्टेंड
पर असल में ऐसा खडा होता नहीं वह बिल्कुल.

बस से उतरकर थका मांदा निकला था बाहर मैं
तो बगल की दीवार ने हाय यह क्या किया!
मेरी नज़रों को खींच लिया अपनी तरफ
इश्तहारों से हक्काबक्का वह दीवार
गुमशुदा लोगों की तस्वीरों से भरी वह दीवार
बच्चों युवाओं बूढों की तस्वीरों से अटी वह दीवार
पर गुमाशुदा होने केलिए उम्र क्या
तस्वीरों के नीचे विवरण उनकी पहचान के
नाम, गांव, कद- काठी
भाषा,वेश भूषा,रंग- रूप
अंत में...
कहीं दिख जाने पर खबर कर देने की
आंसू भरी विनती!
क्या राह भूलने से गुमशुदा हुए थे ये
या चले गए अपनी अलग राह तलाशते
या कोई राह न पाकर दुनिया छोड गए
अपमान,आक्रोश,आवेश?
नादानी,नासमझी,बेचैनी?
क्यों चले गए होंगे?
अब कहां होंगे
किस छांव में
किस धूप में
किस खेमे में
किस चौखट पर
किस नदी में
किस शहर की चकाचौंध से भरी रेगिस्तान में
इनके गांव में इनके घर
राह तकते होंगे इनकी उदास आंखों से
इस खालीपन का बखान कैसे करे कोई!
आदमी के खो जाने से घेर लेता है जो खालीपन
क्या कोई नाप सकता है उसे?
इस नाप तोल से परे हैं
विषाद से भीगे वे घर-
घरों के दरवाज़ों और खिडकियों में
खुला रहता है विश्वास
सही रास्ता पकडकर
कभी न कभी वापस ज़रूर आएंगे
अपने साथ खुशी का राग ज़रूर लाएंगे!

पर कुछ ही दिनों में
ये इश्तहार फीके पड सकते हैं
इनकी जगह नई तस्वीरें नए नारे
ताज़े झूठे विज्ञापनों के महा आफर
दिखाई दे सकते हैं
या इस दीवार को तोडकर
एक माल ही खाडा हो जाए कौन जाने!
कुछ दिन बाद
इनसानों की पहचान ही बदल जाए
कौन कह सकता है!
इन पहचानों के बूते पर
कैसे पहचान पाएंगे
कब पहुंचेगा फिर
उन घरों में खुशी का राग?

चारों तरफ नज़र दौडाई मैंने
कुछ भी नहीं चल रहा था.
चाल तो जैसे रह ही नहीं गई
भागदौड,शोर,मुखौटे,धक्कामुक्की
हर कोई ऐसा चल रहा था
मानो खो गया हो
इस मायाजाल से भरे समय में
किसका पता किसको है
कौन किसे तलाश सकता है
सब के सब पागल हैं!
इश्तहारों पर यकीन करते हैं
कौन इन पहचानों को साथ लेकर जाएगा
इन्सान तो इन्सान
आगे बढ जाने की हठीली दौड में
देश तक हो रहे हैं गुमशुदा
पर यह तो बताइए-
कहां लगाएंगे गुमशुदा देशों की तस्वीरें?
मेरे अंदर उलझे विचारों की आंधियां हैं
इन आंधियों में
क्या मैं भी गुमशुदा हो रहा हूं
या पहले से ही गुमशुदा था?
इस दीवार को फिर एक बार
देख रहा हूं गौर से
क्या मेरी भी तस्वीर है यहां?
नहीं है
पर फिर भी
मुझे जन्म देनेवाला मेरा गांव
न जाने कहां चिपकाता होगा मेरी तस्वीर
अपने मिट्टी सने हाथों से!

मैं गुमशुदा नहीं हूं
इस मिट्टी की बात बताने को
कल ही अपने गांव जाऊंगा
बस में चढकर!

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मूल तेलुगु कविता : दर्भशयनं श्रीनिवासाचार्या

अनुवाद :आर.शांता सुंदरी
टिहिली का ब्याह
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दो पहाडियों के बीच रिश्ता बना.बाजे गाजे बजने लगे.गांव शहनाई और ढोलक के सुरों में भीग गया.पूरा गांव ’धिंसा’नाचने लगा तो रात रंगीन हो गई.हर एक पेड हाथ हिलाते हुए फूल बरसाने लगा.धरती पर चांदनी रुपहले धागों से बुनी चूनर सजाने लगी ...टिहिली के ब्याह में!

पहाडी देवताओं का ध्यान करते हुए,गाते हुए जोडी को आसीस देने की प्रार्थना करने लगा था पुरोहित.उसने दूल्हे को मंडप में लाने को कहा.लोग दूल्हे को ढूंढने लगे...घर में देखा...गली में ढूंढा.गांव का चक्कर लगाकर आए.

इस बीच एक लडका भागता आया और चिल्लाने लगा कि दूल्हा धर्मू,कहीं भी नहीं मिला.

सब उतावले होने लगे.लोग समझने लगे कि टिहिली को चिढाने केलिए कहीं जाकर छिप गया होगा.गांव का पंडित दीसरी उंगलियों पर कुछ गिनते हुए आसमान में सितारों को देखने लगा.मुहूरत में अब कुछ ही समय बाकी रह गया था,तो सब के दिलों में तरह तरह के संदेह और सवाल उठने लगे.

धर्मू के घर के सामने हरे पत्तों का चांदोवा बना था,उसके नीचे एक चारपाई थी.उसपर एक मूसल,रस्सी और अनाज मापने का एक बर्तन थे.घर के द्वार के सामने ताज़ा खोदी गई नाली थी.चांदोवा के नीचे जंगली फूलों की महक फैली थी.नई नवेली दुल्हन टिहिली ने परंपरागत विधि से साडी बांधी थी.उसकी आंखों में हल्की सी नमी थी...

शाम तक शादी की रस्मों में शरीक होता रहा था धर्मू...द्वार के सामने बनी नाली पर खडॆ होकर पुरोहित के आसीस पानेवाला धर्मू...दोनों के पैरों के बीच आग में सुगंधित धूप डालकर,उस धुएं को नाली के पार कराते वक्त,दोनों के पैरों के बीच मुर्गे की बलि देकर उस खून को नाली में बहाते वक्त...टिहिली को गिरने से बचाने केलिए उसकी कमर में हाथ डालकर गुदगुदी पैदा करनेवाला धर्मू...कहां गया?चारपाई पर बैठकर,उल्टे बर्तन पर हल्के से टिहिली के पैरों को अपने पैरों से दबानेवाला धर्मू...रिश्ते नातेदारों से जंगली फूल और पत्ते अक्षत के रूप में स्वीकार करनेवाला धर्मू...मूसल को हाथों से घेरकर टिहिली के गले में हल्दी से रंगा धागा(मंगलसूत्र)बांधने के ऐन वक्त पर वह कहां चला गया?

"मैंने पहले ही कहा ना था? वह पढा लिखा है,उसपर हम कैसे यकीन कर सकते हैं?"किसीने टिप्पणी की.

"चुप कर तू.वह ऐसा नहीं है.पता नहीं उसके साथ कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई?"

तरह तरह के सवाल,शंकाएं सर उठाने लगीं.वहां की हवा इस वजह से गरम हो गई.खुशबू बिखेरनेवाली हवा थम गई.टिहिली की आंखों से आंसुओं की बूंदें एक एक कर गिरने लगीं...

जब धर्मू डिग्री के दूसरे साल में था,तब उसके मेडम ने उसे टिहिली के पास यह कहकर भेजा था कि,इससे बात करके देख लो,तुम्हारे शोध कार्य केलिए शायद कुछ विषय मिल जाए.

धर्मू आदिवासी बस्ती में गया और टिहिली को अपना परिचय देते हुए कहा,"मेरा नाम धर्मू है.केंपस से आ रहा हूं.आदिवासी कलाओं के बारे में शोध कार्य कर रहा हूं."

"टिहिली को संकोच करते देखा तो फिर कहा,"आप इतमीनान रखिए.बस मुझे आपसे सिर्फ कुछ जानकारी लेनी है,बस."धर्मू उसे केंटीन की ओर ले गया.बातों बातों में मालूम हुआ कि धर्मू के मां बाप गुज़र गए और वह रिश्तेदारों के घर में रहकर बडा हुआ.किसी सज्जन की मदद से यहां तक पढाई कर सका,और उन्हीं के प्रोत्साहन से अब यह शोध कार्य भी शुरू किया.यह भी पता चला कि धर्मू भी आदिवासी परिवार से ही है.

"आदिवासी होकर हम इस तरह अपना रहन सहन,वेश भूषा,अपनी भाषा संस्कृति भूल रहे हैं.यह बडे दुःख की बात है,है ना?"उसने चाय की घूंट भरते हुए कहा.

टिहिली ने सिर हिलाकर हामी भरी.

उसके बाद अक्सर दोनों कालेज में मिलने लगे.त्योहारों के बारे में,आजकल गांवों की हालत के बारे में,किसी न किसी बात पर बोलता रहता था धर्मू.उसके रूममेट माज़ाक करते तो भी वह हमेशा गंभीर बना रहता.कभी सीमा नहीं पार करता था.

"टिहिली!"एक दिन उसने नाम लेकर लडकी को पुकारा.

टिहिली ने आंख उठाकर देखा.

"आपका नाम बडा अजीब है!"

टिहिली आंखों से हंसी.

"आपका नाम पुकारता हूं तो लगता है कोई जंगली चिडिया उड रही है...या जंगली फूल हवा में हल्के से झूम रहा है!"धर्मू ने कहा तो टिहिली शरमा गई.

गरमियों की छुट्टियों में...

गांव से दूर पहाड पर टिहिली काम कर रही थी,तभी एक आदिवासी गीत सुनाई दिया...

’आलिरोदूता पहाड पर
कंद मूल उग आए
पत्ते पर लिख भेजा संदेश
बांस की टहनी पर चढ आऊंगी!’

गीत पुराना था.लगता था कोई आदि मानव खुले गले से गा रहा है.पर आवाज़ जाना पहचाना लगा...कहां सुना था? टिहिली सोच में पड गई.

सिर उठाकर देखा ...धर्मू कुदाल लेकर मिट्टी खोद रहा था.वहां अचानक वह दिख गया तो मन के किसी कोने में छुपी खुशी बाहर प्रकट हो गई.अनायास कदम उसकी ओर चल पडे.

पहाड की चोटी...गांव बहुत दूर था.नीला आसमान,हरे भरे पेड,डालियों पर चहचहाते पंछी ,इन्हें छोडकर आसपास कोई नहीं था.

"तुम मेरी देखभाल कर सकोगे?"टिहिली ने पूछा.

"खुद परख लो,मालूम हो जाएगा!"अपने मज़बूत हाथ दिखाते हुए धर्मू ने कहा.

"इतनी दूर क्यों आए?"

"तुम्हारे लिए इन पहाडों को पार करके आ गया."

"खाना खिला सकोगे मुझे?"

"आटे का पसावन बनाकर खिलाऊंगा."

"और क्या करोगे?"

"हाट में लाल चोली का कपडा खरीद दूंगा.बस में फिल्म देखने ले जाऊंगा."

"और?"

"तुम्हें बुखार हो जाए तो दवा देकर सेवा करूंगा."

"और?"

"काले आसमान के नीचे बांहों में भींच लूंगा!"

वह शरमा गई...जैसे लाल लाल ढाक के फूल चारों ओर बिखर गए!

वह हंस पडा,जैसे हवा का झोंका बह गया...जब तक हवा का झोंका चलता रहा,ढाक के फूल गिरते रहे.


* * *



’जेके गांव की लडकी बालों में चमेली के फूल लगा आई
यहां चारपई बिछाकर किस ओर चली गई?’

हवा के साथ यह गीत कानों तक आ रहा था.पहाड,नदियां पार कर,डाली डाली से बतियाते हुए चला आ रहा था वह गीत.वह जमाई सास को संबॊधित करके गानेवाला गीत है.ब्याह से पहले रिश्ता मांगने केलिए आनेवाला यह गीत गाता चला आता है.

दीसरी जानता था कि वे शुभ दिन थे.उसने आसमान की ओर देखा. सूरज सिर के ऊपर चढ आया.ये घडियां भी अच्छी हैं.किसी गांव से लडकेवाले लडकी का हाथ मांगने आ रहे हैं.गाना पास आ गया.सामने वह युवक था.उसके साथ बुज़ुर्ग भी थे.सब अपरिचित.सीधे उसके घर की तरफ आने लगे तो वह हडबडाकर उठा और पीने केलिए पानी देकर चारपई डाली.

"कैसे हैं?कब निकले थे घर से?"दीसरी ने यह जानने के लिए पूछा कि वे किस गांव से आ रहे हैं.

"सुबह सुबह निकल गए थे संदुबडि से."

"अच्छा इसी लिए तो...ओडीशा के पहाडों के पार है ना आपका गांव?तभी कहूं पहचाने नहीं लग रहे हैं!"

देहलीज़ पर साडी और चूडियां रखीं.गिलास में शराब डाली.दीसरी समझ गया कि वे उसकी बेटी का हाथ मांगने आए हैं.

"दूल्हा कौन है?"दीसरी ने पूछा

धर्मू मुस्कुराया.दरवाज़े के पीछे से झांकती टिहिली शरमाकर अंदर भाग गई.दीसरी ने गौर किया.उस दिन पहाड पर धर्मू का गाना और उसके बाद टिहिली के सवालों के बारे में वह सुन चुका था.आदमी का गाना सुनकर औरत जवाब दे तो समझना चाहिए कि उसे आदमी पसंद है.

"आप किस जात के हैं?"दीसरी ने पूछा

"आरिकोलु,और क्या?"

दीसरी ने मन ही मन हिसाब लगाया कि इस जात में पहले कितने लोगों के साथ उसके पुरखों ने ब्याह रचाए थे.

गांव के बडे बुज़ुर्ग एक एक करके आने लगे.लडके को एक नज़र देखकर बैठने लगे.सहेलियां चिढाने लगीं तो टिहिली शरम से लाल होने लगी.दीसरी और बुज़ुर्गों के मन में एक ही सवाल हलचल मचा रहा था,कौन है यह जवान?

मौका पाकर धर्मू ने टिहिली को पकडा और पूछा,"सच बताना,क्या तुम मुझे नहीं पहचानती?"

"मैं तो जानती हूं...पर बाबूजी और गांव के बडे,उन्हें भी तो मालूम होना ज़रूरी है ना?"टिहिली ने उदास होकर कहा.दोनों जानते थे कि उस रोज़ धर्मू के बारे में सब समाचार मालूम न होने की वजह से ही दीसरी ने साडी और चूडियों को छूने नहीं दिया था.शराब को भी हाथ नहीं लगाया था.

टिहिली का बाप उस गांव का मुखिया था.सबको भला बुरा समझानेवाला वही गलत काम करे तो फिर गांव बिगड जाएगा,वहां के नीति नियम खराब हो जाएंगे!इन बातों के अलावा,धर्मू पर शक करने का असली कारण था,जब वह रिश्ता मांगने उनके गांव आया तब...उस दिन...

सारा गांव चांदनी की रोशनी में,ढोलकों के धम धम के बीच उत्सव मनाते हुए नाच रहा था...उसी रात,सोमेसु,उर्फ चम्द्रन्ना ने गांव में कदम रखा.उसके पीछे एक युवती भी थी.ढोलकों की धम धम थमने तक गांव के लोग समझ गए कि वे दोनों पुलिस के आगे आत्मसमर्पण कर चुके हैं,दोनों में प्यार हो गया था और इसलिए गुट में रहकर काम करना मुश्किल हो गया था.आम लोगों जैसा जीवन बिताने का फैसला कर लिया था.यह खबर अगले दिन अखबारों में भी छप गई.

अगले दिन गांव में पुलिस के सिपाही आ गए.एस पी के सामने दोनों ने एक दूसरे को वरमालाएं पहनाईं.एस पी साहब ने दोनों को नये कपडे और आशीश दिए,और कहा"इन्हीं की तरह बाकी लोग भी गुट को छोडकर समाज में आकर मिल जाएं,यही हमारी इच्छा है!"

तभी रिश्ता मांगने आए धर्मू पुलिसवालों से बात करते हुए सबको दिखाई दिया.उस दिन भी उनके मन में यही सवाल उठा,’कौन है यह?’इसके गांव में कदम रखते ही यह आत्मसमर्पण करनेवाले अचानक कैसे आ धमके?फौरन पुलिस,पत्रकार...! किसका आदमी है यह?सब के दिलों में डर,संदेह उठने लगे.

शादी का मंडप सुनसान हो गया...हर तरफ खामोशी छा गई.सब अपने अपने काम में मशगूल हो गए .तरह तरह की बातें करने लगे..."ब्याह में माइक सेट का होना ज़रूरी है.बेंड होना चाहिए,यह क्या है भाई पुराने ज़माने का ब्याह लगता है?"एक युवक झुंझला उठा.

"कहीं पुलिस ने तो कुछ नहीं किया...?"किसीने कहा.अचानक उस बात से मंडप में फैली खामोशी टूट गई.

"अरे क्या बात करते हो भाई?उन्हें इससे क्या लेनादेना?"धर्मू के एक दोस्त ने कहा.

"क्या जाने?हमारे गांव में वही एक पढालिखा बंदा है.बात बात पर टाउन जाता रहता है.इसी बात से कहीं उसपर उन्हें शक हो गया हो...?"

"अरे बेकार की बातें करके हमको भी डरा रहे हो...छोड ना...!"कहने को तो कह दिया पर उस आदमी के मन में भी डर घर करने लगा....कहीं यही सच ना हो...

टिहिली का दिल ज़ोरों से धडकने लगा.उसकी आंखें भर आईं.मंडप में हो रही बातें और पुरानी यादें मिलकर उसके मन में खलबली मचाने लगीं...

’सास से कहकर पिटवाया
ससुर से कहकर पिटवाया
सासू मां कहो तुम्हारी बेटी से बाहर आए
मैं फूल देकर चला जाऊंगा’

कुवी बोली में दूल्हा धर्मू गाते हुए नाचने लगा.उसके पीछे पहाड चलकर आएगा ,उसपर बहता झरना चलकर आएगा.सारे पत्ते मिलकर उसके गीत में ताल दे रहे हैं.

फिर एक दिन...

साडी और चोली देहलीज़ पर रखीं.गिलास में शराब डालकर रखा.

दीसरी ने बेटी की ओर देखा.उसके चेहरे पर उदासी थी.वह बाप की इजाज़त का इंतज़ार कर रही थी.नहीं माना तो...? आधी रात को उसके साथ...!तब वह क्या कर सकेगा?बेटी ने जो इज़्ज़त दी उसे बनाए रखना ही ठीक होगा.बिन मां की बच्ची है.उसके मन मुताबिक शादी करना ही ठीक है,यह मेरे लिए भी खुशी की बात होगी.दीसरी सोचने लगा.सब उसके फैसले के इंतज़ार में थे.

उसने सिर हिलाया...’हां’ कहा.शराब का गिलास उठाया,दो चार बूंद मुंह में डालकर दूल्हे के बाप को दिया.टिहिली की आंखों से चांदनी झरने लगी.उसकी हंसी सुनकर गली के छोर पर ढोल बज उठा.सब लोगों ने शराब पी.साडी और चूडियों की तरफ टिहिली ने प्यार से देखा.शहनाई के सुरों में सारी गलियां भीग गईं.जंगल पर से गुज़रकर वह खुशबू धर्मू के दिल को छू गई.सारा गांव पंक्तिबद्ध होकर धिंसा नाचने लगा.

बेटी के ब्याह का महूरत निश्चय किया दीसरी ने.उस धूमधाम के बीच वापस लौटते वक्त एक युवक ने आकर धर्मू के कान में कुछ कह दिया.धर्मू के चेहरे का रंग बदल गया.

"इस वक्त?"धर्मू ने पूछा.

"हां,अभी...गांव के बाहर हैं वे"युवक ने बताया.

"चल..."धर्मू उसके साथ हो लिया.

गांव के सिवानों में,सडक से दस कदम दूर पेड के नीचे एक सेंट्री खडा था.उसके पीछे भारी बैग और हाथियार लिए चट्टानों पर बैठे थे कुछ लोग...काले सायों की तरह.जंगल के अंदर कहीं एक तीतर बोलने लगा.चांद को एक बादल का टुकडे मे ढंक दिया.

"अब तुम जा सकते हो,"यह सुनते ही धर्मू वापस लौट आया.

दीसरी ने जो महूरत निशित किया वह घडी आ गई.दूल्हे का परिवार दुल्हन के घर पहुंच गया.ढोलकों का शोर,शहनाई के सुर पहाडों में गूंजने लगे.पुरोहित सभी पहाडी देवताओं का स्मरण करते हुए प्रार्थना करने लगा कि लडकी को सभी भूत प्रेतों से बचाए,वह खूब बच्चे पैदा करे और सुखी रहे.उसके बच्चे पहाड पर कामकाज करने की हालत में तंदुरुस्त रहें इस बात का आशीर्वाद देने लगा.

नई लुंगी में चावल बांधकर,मुर्गे को देवता के आगे रखकर फिर दूल्हे को पकडाया.घडियां गिनने के बाद कहा,"अब निकल पडो!"

" यह लडकी हमारे संग खेली थी
साथ मिलकर काम करती रही
अब तेरे संग चल पडी
डाल की कली कहीं मिट्टी में न गिर जाए
फूल बने
फल बने
बीज बन फिर उगे..."

अपनी बोली में, सारा गांव, यह गीत बनकर,टिहिली और धर्मू को विदा करने सिवानों तक साथ चला.नई कोंपल से भरे ढाक के पेड सी थी टिहिली.जंगल की समूची सुंदरता उसके चेहरे में रौनक पैदा कर रही थी.लोगों ने उसके सिर पर फूलों की छतरी पकडी.उसके ऊपर साडी को फैलाकर पकडा.फूल जैसी लडकी पर कोई भी फूल ना गिरे...इमली का फूल तो बिल्कुल भी ना गिरे...ऐसे उमंग से भरे गीत गाते हुए चलने लगे.

"आपकी लडकी हमारे घर का दीया होगी
सुख हो या दुःख हमारे संग रहेगी
यह हमारे घर की देवी है
इसकी आंखों को कभी भीगने नहीं देंगे हम"

दूल्हे का मामा टिहिली को कंधे पर उठाकर आगे बढा.पत्थरों पर चलते वक्त कहीं उसके पैरों का महावर बिखर न जाए इस बात का ध्यान रख रहे हैं.रास्ते भर जंगली फूलों की महक चलने के श्रम को भुला रही है.पहाड,नदियां,मेंड पार करते हुए चांदनी की धारा में आगे बढते जा रहे हैं.

बारात के मंडप में पहुंचने तक जंगल पर चांदनी छाई रही.पुरोहित और दीसरी मिलकर आधी रस्में पूरी कर चुके थे.इतने में यह खबर मिली.

टिहिली सोचने लगी...

न जाने कहां गया?किस ओर गया?
क्या मुझे धोखा देना चाहता है?
नहीं,धर्मू आएगा...ज़रूर मेरे लिए आएगा.बाकी शादी की रस्में भी पूरी होंगी.धर्मू तब मेरा अपना हो जाएगा.महूरत की घडियों के खत्म होने से पहले आ जाएगा.

ब्याह होगा.सुबह होगी.गांव छोडकर गाजे बाजे के साथ बिदा हो जाऊंगी.बहती धारा में वह मेरी कमर पर हाथ डाले मेरे पीछे खडा हो जाएगा.दोनों के पैरों के बीच पुरोहित मुर्गा रखकर उसे काटेगा.लाल रंग का पानी हमारे पैरों के बीच से होकर बहेगा.पुरोहित दोनों को आशीश देगा.धर्मू मुझपर पानी डालेगा.मैं भी डालूंगी.भीगे ,हल्दी से पीले कपडों में उसके स्पर्श से मैं सराबोर हो जाऊंगी.फिर दोनों तरफ के रिश्तेदार एक दूसरे पर नदिया का पानी छिडकेंगे.नदिया रंगों से भर जाएगी.भीगे कपडों में उसका गांव पहुंच जाएंगे.एक हरे भरे पेड के नीचे दूल्हे की बहनों और बहनोइयों को मैं हल्दी मिले पानी से स्नान कराऊंगी.

उसके बाद...

बुज़ुर्ग लेन देन की बात करेंगे.धर्मू वचन देगा कि वह मेरी अच्छी देखभाल करेगा.वचन तोडने पर जुर्माना भरने का भी वादा करेगा...

उसके खयालों में अडचन पैदा करते हुए अचानक मंडप में हलचल मच गई.

एक लडका दौडता आया.वह तेज़ दौडने से हांफ रहा था."अरे क्या बात है? क्या हुआ?"पूछते हुए सब उसके पास पहुंच गए.

"वहां...नदिया के किनारे...धर्मू बेहोश पडा है...!"उसने बताया.

सब चिंतित हो गए,घबरा गए..."कहां? बता...किधर?"वे परेशान होकर पूछने लगे.

उस लडके ने रास्ता दिखाया.उसके पीछे लोग मशाल और टार्च लेकर दौड पडे...

नदिया के किनारे...घाटी में...खून से लथपथ...शादी के कपडों में बेहोश पडा था धर्मू.उसे उठाकर बाहर लाए.पानी छिडक कर होश में लाने की कोशिश करने लगे.

ज़रा सी हरकत हुई...उसने आंखें खोलीं.उसे घेरे खडे थे उसके अपने.उनके सिरों के ऊपर घने पेडों की छतरी थी....उससे परे था नीला आसमां.आस्मान में तारे टिमटिमा रहे थे.

तारों को देखते हुए धर्मू ने पूछा,"महूरत निकल गई या अभी वक्त बाकी है?"

"अभी वक्त है बेटा...पर तू यहां कैसे गिर गया रे?क्या हुआ था?"धर्मू के रिश्तेदारों में से ऎक बुज़ुर्ग ने रुअंसे स्वर में पूछा.

"टिहिली कहां है?"धर्मू ने पूछा.

टिहिली दौडती आई.सब लोग हट गए और उसे रास्ता दिया.

धर्मू के हाथों में अधमरा खरगोश था. उसे टिहिली के आगे किया धर्मू ने.उसने कहा,"शादी से पहले अकेले शिकार करने का रिवाज है ना?"

"अरे,कमाल है बेटा...हम तो घबरा गए थे.पर आजकल यह रिवाज कहां रह गया है रे?यह तो अब पुरानी बात हो गई,सब छोड चुके हैं!"

"रिवाज तो ज़रूरी है!निभाना ही पडता है ना?"

"ठीक है...अब उठो...शुभ घडी निकल जाएगी.उससे पहले यह बांध दे,"कहकर हल्दी लगा धागा उसके हाथ में दिया पुरोहित ने.

ढोलक् बज उठा.मंजीरे ने भी साथ दिया.साथ ही धिंसा नाच भी शुरू हो गया.पहाड गूंज उठे.जंगल खुशी से झूम उठा.

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मूल कहानी : मल्लिपुरम जगदीश

अनुवाद : आर.शांता सुंदरी