Friday, January 3, 2014

अक्षरों का अर्तनाद

                                                                  मूल तेलुगु : डा.धेनुवकोंड श्रीराम मूर्ति
                                                                  हिंदी अनुवाद : आर.शांता सुंदरी


क्षमा करो मुझे
संक्षिप्ताक्षर बन सिमटना नहीं चाहता मैं
इसी लिए जा रहा हूं पराया देश बिककर
माफ करो मुझे
ये भयानक प्रवास
हाहाकार
गाली गलौज़
पुतले जलाकर अग्नि कांड
बीच सडक कर्म कांड
ये सारे रास्ते
बन गए नरक द्वार
स्व-नियंत्रित
रहस्यमयी कुतंत्र मॆं
कब जी पाएग
हरेक नागरिक आराम से?

यहां पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण
काम नहीं करता इन्सान पर
बस,है तो सिर्फ धनाकर्षण!
शरीर पर घाव है
पर कहां है नहीं मालूम
आकुल व्याकुल है मन पीडा से


महामाया के तंत्र-योग में है
प्रकाश
सोख लिया जिसे शरीर ने
जाना है जिस देश
वहां गए बिना ही
गुज़रते जा रहे हैं दिन
गली में
किसीके कदमों की आहट
आशा जागती है मन में
कहीं शांति की पदचाप तो नहीं
आज के शिशिर ऋतु केलिए
कल के पत्ते
पीले पडकर
झर रहे हैं

देश की देह को
नदियों में
न बांटनेवाले देश में
इन्सान में भलाई है जिस देश में
पेडों पर कोंपलों की आशाएं
फूटने के देस में
हे प्रभू!
ले जाओ मुझे!!


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जीवन एक यादें अनेक


देह के वस्त्र को
कृष्णा नदी में संचय करते समय
शरीर छोडने की आहट
छोड गए जो यादें मेरे पिता
घेरने लगी हैं मुझे.
कभी किसीके आगे
पसारा नहीं था हाथ
नहीं दिया था किसीको धोखा
नहीं झुकाया था सिर किसीके सामने
पिता जी का रहा
इच्छारहित जीवन
दुःख के मौसम का जीवन
हमेशा मांगते थे
’अनायास मृत्यु’
महामौनि की मौत.

मेरे बाल्य के प्रवाह को
मोड देनेवाले पिता
नादान उम्र में
सावधान और सतर्क रहने की सबक
सिखानेवाले पिता .

खुद को समझने ही लगा था
जब गुज़र गई मां भी
एकांत में रुदन
अंतर्दाह की जलन
अनुभव के स्वप्नों का असहाय विषाद
जीवन एक
यादें अनेक.

देह जब बनने लगे निर्देह
तब पिता की शव-यात्रा.

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गांव डूब गया (सबमर्ज्ड विलेज)


आंखे बंद नहीं
पर देख रहा हूं सपना
अचेतन स्वप्नावस्था में
चलते,तैरते,उडते हुए
धीरे से,धीरज से,भोलेपन से
शाश्वत विनाश में
जल-समाधि में डूबे गांव को
डूबे आदमी के निशान को
ढूंढ रहा हूं मैं.

धेनु विचरता था जिस पहाड पर
राम की अटारी के ऊपर
पीपल पेड के नीचे
झरती यादें
कान्हा की बांसुरी में भरी
चांदनी की हवा
ईश्वर - कुएं की रहट पर
रसीले सुर बजानेवाली उंगलियां
चौपाल पर सुनाया गया
सम्मोहित कर देनेवाला कविता-गान
सुख-शांति से भरा गांव का जीवन
आम इन्सान और महात्मा
बसते थे जहां सुगंध बन महान
नदी के हृदय को हाथों से छूनेवाली
जल-यज्ञ संस्कृति का
ब्रेंड एंबासिडर जैसा
गुंड्लकम्म!*

***

परियोजना का प्रतिबिंब
दिखता है जल्लद के चेहरे-सा
खेत
सूख गए पानी के अभाव में पिछले साल
डूब गए बाढ की चपेट में आकर आज

***

आंसुओं से तप्त
क्षुब्ध क्षण
लेकर देह असंतृप्त कामनाओं की
उतरकर पितृलोक से नीचे
आदिलक्ष्मी कामेश्वरी की करते हुए अर्चना...
अपनी कोई वस्तु यहीं छूट गई
ऐसा सोचकर
उसे ढूंढनेवाले पूर्वज
चमेली के उपवनों
केतकी के परागकणों
रसभरे फूलों के उद्यानों
और तंबाकू के बागानों में
हरे कोमल पत्तों को तोडते
मदभरे गान
गेहूं की बालियों के
फूलों के हार
***

यादें मिटी नहीं
चक्कर काट रही हैं
नदिया के छोरों पर
लिपि नहीं आती समझ में
देख रहा हूं झुककर घुटनों के बल.

*एक नदी का नाम

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Monday, April 1, 2013


कृष्णुडु
कृष्णुडु
ए .कृष्णा राव  का पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन दशकों का अनुभव है। दिल्ली में लगभग दो दशकों से कार्यरत। पिछले बारह सालों से ‘आन्ध्र ज्योति’ दैनिक में दिल्ली ब्यूरो के चीफ के पद पर काम कर रहे हैं। इससे पहले कुछ और पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। वह केवल पत्रकार ही नहीं, लेखक और कवि  भी है। इनके स्तम्भ ‘इण्डिया गेट ‘शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हो चुके हैं। कवितायें कृष्णुडु  के नाम से लिखते हैं। इनके दो कविता संग्रह छप चुके  हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य संबंधी आलेख भी प्रकाशित हुए हैं। उनकी एक कवि‍ता। तेलुगु से इसका अनुवाद आर.शान्ता सुन्दरी ने कि‍या है-
रो रोकर माँ की आँखों सा
लाल हुआ आसमान
खाने को कुछ  नहीं है
‘माँ, भूख लगी है…’
शून्य में ताकती माँ
कुछ नहीं बोली
उसकी आँख बचाकर
धीरे से निकला बाहर
उखड़ते प्राणों में
साँस लौट आई फिर
गलियों की नीरवता को
तोड़ती सेना की गाड़ियाँ
दूर कहीं से सवाल करते
आर्तनाद…
कल परसों तक
सबक सिखाती पाठशालाएं
बन गई हैं सैनिक शिविर
हमारे नन्हे पैरों के स्पर्श से
पुलकित हरी दूब  को
कुचलती जूतों की कवायदें
किसके साथ खेलूँ?
घोंसलों से छितराए पंछियों जैसे
परिवार
निश्शब्द है
बौद्ध मन्‍दि‍र
शव सा बैठा है बुद्ध
इर्द-गिर्द रिसते खून पर
भिनभिनाती हैं मक्खियाँ
घर में माँ नहीं दिखती
ध्वस्त हैं आनेवाले कल के सपने
सड़क पर मौत का वीभत्स
हाथ पीछे बंधी लाशें
लगता है बारिश होगी
कहाँ हो माँ?
कब आओगी?
तुमने कहा था स्वर्ग है
पर वह कहाँ है?
रुकी जीप …
उतरा अंकल …
‘बाबा से मिलोगे?’
‘जी अंकल !’
‘देख तेरे सीने में है
जारे अपने बाबा के पास जा… ‘
पाँच गोलियों में छिपे
पंच-प्राण
आसमान ने भिगोया देह को
आँसुओं से
तभी बादलों की ओट  से
निकल आया बालचंद्र
देखते हुए उसे
बाबा में मिल गया मैं

Sunday, January 6, 2013


द्वैत
---

शरीर हो गया एक ऐतिहासिक दोष
दो होंठ,दो गाल
दो स्तन,दो जांघें...
युगल सौंदर्य
दो दशकों में ही जैसे ज़िंदगी हो गई खत्म

ज़िंदगी इतनी तंग हो गई कि
ज़रा सा हिलो तो उधडने लगती है
दीवारों का रहस्य खोले बिना ही
ग्राफिती बदरंग होने लगी
कल न जाने किसकी बारी है?
गलत मत समझना,
लगने लगा है
पास खडा हर आदमी जैसे
जांघों के बीच अपने
भाले को लेकर चल रहा हो
समंदर और आसमान को मिलाकर बुनने पर भी
इस अनादि प्रस्तर युग के नंगेपन को
ढकने के लिए
हाथ भर का कपडा नहीं मिलता

आंख खुलने पर ही तो
पता चलेगा ना
कि सुबह हो गई
जिस अंग में आंखें ही नहीं
उसके लिए
बधिरांधकार ही आनंद है
आंतों को ही नहीं
दिल को भी उखाडते हुए
बदन में अंधेरा सीधे खंता बन
धंस जाता है
गलत मत समझना,
कीडों से कीटनाशन की आशा करते हुए
मृत्यु से अमृत मांगते हुए
जानवरों से जानवरों का बहिष्कार कौन करता है?
मानवता के युटोपिया में
सिग्नलों के बीच मुख्य सडकें
जब बन जाती हैं खामोश आक्रंदन
कान फटनेवाले
सवालों के यहां गोलियां उग रही हैं
तो क्या हुआ?
विवेक पर लाठियां बरस रही हैं
झूठी सहानुभूति,गंदी गालियां
आंसू पोंछ रही हैं
सुरक्षा दलों का फैलाव
आंसू गैस के बादल बन
विश्वासों पर छाने लगा है
शहर एक मृत्यु का हथियार बन गया
अपना और पडोस का घर
हरा घाव बन अकुलाने लगते हैं
हम दोनों का अस्तित्व कायम रहना हो
तो तुम्हें मुझमें
मनुष्यता बन स्खलित होना पडेगा
मुझे तुम्हारे अंदर
मातृत्व बन बहना होगा
शरीर के दोषी हो जाने के बाद
प्राणों के स्पंदन बुझ जाने के बाद
दरिंदगी में तर्जुमा हो जाने के बाद
मरीचिकाओं के बांझपन मेंं
प्रवासी होकर प्रवेश करने के बाद...
मां भी तेरे लिए
एक गलत रिश्ता बनकर रह जाएगी...
गलत मत समझना,
अब यहां लाशघरों के सिवा
प्रसवघरों की कोई ज़रूरत नहीं!

मूल तेलुगु कविता : पसुपुलेटि गीता
अनुवाद : आर.शांता सुंदरी

Monday, November 19, 2012


‘प्रेमचंद घर में’ का तेलुगु में अनुवाद

सभी मानवीय सम्‍बन्‍धों में पति-पत्नी का सम्‍बन्‍ध अत्‍यंत घनिष्ट है और अत्यधिक समय तक उनका साथ बना रहता  है। पति की मृत्यु के बाद उनके साथ बिताए जीवन के बारे में ईमानदारी से लिखने का चलन भारतीय साहित्य में कम ही देखने को मिलता है। ‘प्रेमचंद घर में’ में शिवरानी देवी ने यह करके दिखाया।वार्तालाप के माध्यम से अधिक और स्वगत-कथन के रूप में कई जगह उन्होंने जो भी लिखा उन बातों से न केवल प्रेमचंद के महान व्यक्‍ति‍त्‍व का, बल्कि लेखिका की विलक्षण प्रतिभा का भी परिचय मिलता है। कभी-कभी आगे रहकर उन्होंने प्रेमचंद का मार्गदर्शन भी किया था, ऐसे कई उदहारण इस पुस्तक में मिल जाते हैं। शिवरानी देवी की सूझ-बूझ और निडर व्यक्तित्व उभर आता है।
प्रेमचंद से अपरिचित तेलुगु साहित्य प्रेमी विरले ही होंगे। प्रेमचंद घर में पति, पिता के रूप में कैसे थे और शिवरानी देवी और प्रेमचंद का सम्बन्ध कितना विशिष्ट था, यह जानने के लिए सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिये।
मूल पुस्तक में दि‍ये गये प्रोफेसर प्रबोध कुमार (प्रेमचंद के नाती) और स्वयं शिवरानी देवी के कुछ शब्दों को भी अनुवाद में लिया गया है।(शिवरानी देवी का पूरा वक्‍तव्‍य और प्रबोध कुमार के, ‘मेरी नानी अम्मा’ से कुछ अंश)।

प्रेमचंद में कहीं भी पुरुष होने का अहंकार नहीं था। वह पत्नी की बहुत इज्ज़त करते थे। उनकी सलाह बात-बात पर लेते थे। अगर किसी विषय में मतभेद रहा भी तो बड़े प्यार से समझाते थे। पत्नी से उन्हें बेहद प्यार था। शि‍वरानी देवी बहुत स्वाभिमानी थीं और प्रेमचंद को प्राणों से भी अधिक मानती थीं। प्रेमचंद की ज़िंदगी और मौत से जूझने वाले समय का उन्होंने ऐसा जीवंत वर्णन किया है कि  पढ़ने वालों  का कलेजा मुँह को आ जाता है। प्रेमचंद के बारे में, उनकी रचनाओं के बारे में, साहित्यिक व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पर शिवरानी देवी की किताब में इन सब बातों  के साथ-साथ बहुत ही अन्तरंग बातें, जो केवल एक पत्नी को ही मालूम होती हैं, उनका ज़िक्र भी किया गया है। पति-पत्नी के बीच सम्‍बन्‍ध कितने सुन्दर, गहरे और प्यार से भरे हो सकते हैं, यह जानने के लिये भी यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
इस पुस्‍तक का तेलुगु में अनुवाद शांता सुंदरी ने कि‍या है। इसका शीर्षक तेलुगु में ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’ (इम्ट्लो मतलब ‘घर में’) है। पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने से पहले यह धारावाहिक के रूप में ‘भूमिका’ नामक मासिक पत्रिका में, जनवरी 2009 से जुलाई 2012 तक प्रकाशित हुई। पहली क़िस्त के बाद ही कइयों ने इसे बहुत पसंद किया। प्रेमचंद की केवल रचनाओं से परिचित पाठकों को उनके व्यक्तित्व के अन्दर झाँककर उन्हें अच्छी तरह समझाने का अवसर मिला। प्रसिद्ध कवि‍ वरवर राव ने अनुवादक शांता सुंदरी को दो-तीन बार फोन करके बताया की कुछ अंशों को पढ़कर उनकी आँखें नाम हो गयीं। तेलुगु के अग्रणी लेखकों ने इसे पुस्तक रूप में देखने की इच्छा ज़ाहिर की और इसे सम्‍भव बनाया ,हैदराबाद बुक ट्रस्ट की गीता रामास्वामी ने।
पुस्‍तक: ‘इम्ट्लो प्रेमचंद’
मूल लेखि‍का : शि‍वरानी देवी
अनुवाद : शांता सुंदरी
कुल पन्ने : 274
मूल्य : 120 रुपये
प्रथम संस्करण : सितम्बर, 2012
प्रकाशक : हैदराबाद बुक ट्रस्ट,
प्लाट नंबर 85, बालाजी नगर,
गुडीमलकापुर, हैदराबाद- 500006
This entry was posted by author: admin on Saturday, November 17th, 2012 at 7:07 am and is filed under परिक्रमा | Tags: · , , , , , You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site. | चिट्ठाजगत | Blogvani.com

One Comment »

  • sumit said:
    शि‍वरानी देवी की कि‍ताब ‘प्रेमचंद घर में’ का तेलुगु में अनुवाद में करके शांता सुंदरी जी ने महत्‍पवूर्ण कार्य कि‍या है। इसके लि‍ए उन्‍हें धन्‍यवाद। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि‍ अब तक इस तरह की महत्‍वपूर्ण कि‍ताबों का अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद क्‍यों नहीं हुआ है। तमाम अकादेमि‍यां और संस्‍थाएं क्‍या कर रही हैं। क्‍या कुर्सी और पुरस्‍कार के लि‍ए जोड़-तोड़ करना ही साहि‍त्‍य के कर्णधारों का काम रह गया है।

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Sunday, November 18, 2012


सूपर सिंड्रोम
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तेलुगु मूल : सलीम
अनुवाद : आर.शांता सुंदरी
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गुरुवार का दिन था.शाम के छः बज रहे थे.सब्ज़ी खरीदने थैली लेकर चप्पल पहनने लगी तो बेटी मधु ने कहा,"मां मैं भी साथ चलूं?"
"नहीं बेटा,तू पढाई कर.मैं आधे घंटे में आ जाऊंगी."
मधु ने मीठी हंसी हंसते हुए कहा,"कहने पर भी नहीं मानती ना? बडी मंडी में सब्ज़ियां सस्ती मिलती हैं,यही बहाना बनाकर जाती तो हो,पर सोचो,जाने आने का आटो का खर्चा भी जोडकर देखो तो सस्ता थोडे ही पडता है?"
मैं तो हर हफ्ते यही सुनती हूं,आदत सी हो गई! मैं बाहर निकलने लगी तो पीछे से मधु ने कहा,"अब थोडे दिनों की बात है.फिर घर के पास ही फुड वर्ल्ड सूपर मार्केट खुल जाएगा.तब हम वहीं से सारा सामान खरीद सकेंगे!"
"मुझे तो बेटा,बडी मंडी जाना ही अच्छा लगता है.वहां सब जाने पहचाने लोग हैं."
"अरे आदत वादत छोडो मां.अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि अपनी सहूलियत देखनी पडती है.दाल,चावल,सब्ज़ी,मसाले,फल सब एक ही छत के नीचे मिल जाते हैं तो कितना अच्छा है ना? और फिर साफ करके पेकेटों में बंद होकर बेचे जाते हैं.कीमतें भी ज़्यादा नहीं होतीं."
मैं उसे कुछ जवाब दिए बिना बाहर आकर मंडी के लिए आटो पकड ली.
मैं आटो से उतरकर पैसे चुकाने लगी तो रामुलम्मा ने आवाज़ दी.वह औरत पत्तेवाली सब्ज़ियां बेचती है.मुझे देखते ही उसका चेहरा खिल उठा.मैं भी उसकी तरफ खिंची चली गई.
"पिछले हफ्ते नहीं आई बीबी जी?मैं ने बहुत इंतज़ार किया था!कहीं बाहर गई थी क्या?"रामुलम्मा ने पूछा.
मैं उसके आगे बिछी बोरी पर से हरा धनिया,कडी पत्ता,पुदीना वगैरह लेते हुए कहा,"नहीं, बुखार हो गया था."
"तभी कहूं कि इतनी कमज़ोर दिख रही हो आप!मैं भी सोच रही थी कि कम से कम फूल खरीदने तो ज़रूर आती हर वीर वार को!"
"अच्छा कितने पैसे हुए,बोलो?"मैंने पैसे चुकाए और पूछा,"तेरी बेटी की गिरस्ती कैसी चल रही है?सब ठीक तो है ना?"
"क्या बताऊं बीबी जी?बार बार पैसा मांगता है मेरा जमाई.कहां से लाऊं? अभी परसों फिर पच्चीस हज़ार मांग रहा था.कहां से लाती इतना रुपया?"
मैं चुप रही.मन खराब था पर कुछ सूझा नहीं कि क्या कहूं.फिर भी उसे दिलासा देकर आगे बढ गई.
चार कदम चलकर सब्ज़ी वाले के पास पहुंची.कनकय्या सब्ज़ी बेचता था.सत्तर साल की उम्र,उसके तीन बेटे थे,जो अच्छी नौकरियां करते थे.फिर भी उसे धूप बारिश और सर्दी में सब्ज़ी की मंडी आना पडता.एक भी बेटा उसकी देख भाल करने को तैयार नहीं था.पहले रेडी पर सब्ज़ी डालकर गली गली घूमता था,पर अब कमज़ोरी की वजह से एक ही जगह रहकर बेचता है.
कभी मेरे पूछने पर उसने अपनी रामकहानी मुझे बताई थी.
मुझे देखते ही बच्चे की तरह मुस्कुराया.सामने के दांत टूट जाने से उसका मुंह पोपला हो गया था."पिछले हफ्ते आप नहीं आईं तो समझा किसी और से सब्ज़ी खरीद ली होगी,"उसने कहा.
"हमेशा तुमसे ही लेती हूं ना?और कहां जाती?"
"तुम्हारे बेटे कैसे हैं?"मैंने पूछा और उसकी मुस्कुराहट पुंछ गई.बहुत देर तक सब्ज़ी तोलते हुए चुप रहा.मुझे लगा उसकी आंखें नम हो गईं हैं.फिर उसने सब्ज़ी मेरी टोकरी में डालते हुए मेरी ओर देखा और कहा,"सच कहूं बेटी? कल को मैं मर गया तो लाश को ठिकाने लगाना तो दूर ,देखने भी नहीं आएंगे.तुम जैसी कोई भला मानुस ही शायद वह काम कर दे,मैं भगवान से रोज़ यही दुआ मांगता रहता हूं!"
इन लोगों की बातें सुनकर मेरा मन खराब तो होता है,पर उन्हें लगता है कि चलो हमार दुखडा सुननेवाला कोई तो है!मैंने हिम्मत बंधाते हुए कहा,"यह कैसी बातें कर रहे हो?तुम्हें कुछ नहीं होगा.सौ साल ज़िंदा रहोगे!"
"नहीं बेटी ,मुझे ऐसी आशा बिल्कुल नहीं है.अकेले जीना बहुत मुश्किल है.सबके होते हुए भी मैं अकेला हूं.ऐसी ज़िंदगी भगवान किसीको न दे!"
अपनी तरफ से उसे तसल्ली के दो चार शब्द कहकर मैं फूल खरीदने चली गई.मस्तानम्मा ने भी मेरे पिछले हफ्ते न आने की वजह पूछी.हमेशा मैं उससे पांच हाथ चमेली के फूल खरीदती हूं.मुझे देखते ही फूलों की तरह हंस् दी और पूछा,"क्या बात है?पिछले हफ्ते नहीं आईं?"उसकी हंसी बडी खूबसूरत् है.मुझे वह हंसी बहुत अच्छी लगती है.एकदम स्वच्छ और निष्कपट.और वह मुस्कुराती भी बहुत है.शायद इसके शौहर  कहता हो कि तेरी हंसी बडी खूबसूरत है!
"दस हाथ फूल मालाएं देदूं?"उसने पूछा.मैं तो हमेशा पांच हाथ ही लेती हूं,सॊ कहा कि पांच काफी हैं."क्यों बहन जी,हमेशा सारे फूल भगवान को ही चढा देती हो? खुद नहीं बालों में सजाती?"उसने पूछा.
पर वह मानी नहीं.कुछ फूल खुद मेरे बालों में गूंथने की ज़िद करने लगी.बाज़ार में और आना कानी करना ठीक न समझकर मैं मान गई.मस्तानम्मा के हाथ मे बीस रुपये रख दिए.उसने हैरान होकर पूछा,"इतने रुपये किसलिए?"
"दस हाथ के फूल लिए हैं ना?"
"नहीं जी,मैं तो सिर्फ पांच के पैसे लूंगी.मैंने उतना ही बेचा है.बाकी तो मैं तुम्हें अपनी खुशी से दे रही थी."
"अरे यह क्या बात हुई? मैं जानती हूं फूल बेचकर तुम्हारे पास कितने पैसे बचते हैं.लो,ये दस रुपये भी ले लो!"मैंने ज़बर्दस्ती दस का नोट उसे पकडाने की कोशिश की.
"हां,मैं फूल ज़रूर बेचती हूं,पर बहन के बालों में फूल लगाकर उसके पैसे वसूल नहीं कर सकती!"
मैंने उसे शुक्रिया कहा और जवाब में वह फिर फूलों की तरह हंसी.
घर पहुंचते पहुंचते सात बज गए.
"देखा मां कितना टाइम लगा दिया.पास में ही सूपर मार्केट खुल जाएगा तो वक्त ज़ाया न करना पडेगा ना?"मुझे देखते ही बेटी बोली.

                                                * * *

हमारे घर से सौ गज़ की दूरी पर फूड वर्ल्ड सूपर मार्कॆट खुल गया.उद्घाटन समारोह में कोई अभिनेत्री भी आई थी.पूरे मुहल्ले में पेंफ्लेट बांटे गए.अखबारों में बडे बडे विज्ञापन दिए गए.
मधु मचल उठी,"चलो मां ऊड वर्ल्ड चलें.खुद देख लेना कि यह कितनी शानदार दूकान है.फिर कभी तुम मंडी जाने की बात नहीं करोगी.अमेरिका जैसे देशों में तो सिर्फ ऐसी ही दूकानें होती हैं.हमारे जैसे वे सडकों के किनारे रेडियां नहीं लगाते और न ही गली गली घूमकर चीज़ें बेचते हैं.सब काम सलीके से किए जाते हैं.देखा, अमरिका से हम कितने पिछडे हुए हैं?"
"अच्छा सूपर मार्केट खोल दिए तो मतलब तरक्की कर ली,और गली गली घूमकर बेचा तो पिछड गए?मैं नहीं मानती तेरी बात!"मैंने कहा.
"सिर्फ इतना ही नहीं मां,अमेरिका में सेल फोन हमसे पहले आया था.उनके देश में आइमेक्स सिनेमा थियेटर खुलने के कई साल बाद हमारे देश में इनका दौर शुरू हुआ.इस दौड में हम रफ्तार नहीं बढाएंगे तो हमेशा के लिए पीछे ही रह जाएंगे!सोचकर ही खराब लगता है..."
"सुनो,इन्सानी रिश्ते कितने बेहतर बन रहे हैं,इसी बात से विकास को आंकना चाहिए,मशीनी प्रगति से नहीं!"
"मां वक्त बदल रहा है.हमारी पीढी की सोच अलग है...चलो बातें बाद में भी कर सकते हैं,पहले फूड वर्ल्ड देख आते हैं."
बडा विशाल आहाता,अंदर सब सामान सलीके से शेल्फों में सजाकर रखा था.दाल चावल,सब्ज़ियां,फल,सब अपनी अपनी जगह.कास्मेटिक्स के लिए अलग जगह.लगा यह विनिमय का संसार है.मधु ट्राली ले आई और उसमें अपनी ज़रूरत की चीज़ें डालने लगी.जब सब्ज़ियों के पास पहुंचे तो बोली,"देखा मां,कितनी ताज़ी हैं?इनमें खराब सब्ज़ियां बिल्कुल नहीं होतीं.ये खुद उन्हें फेंक देते हैं!"
"सब्ज़ियां पोलीथीन थैलियों में पेक करके रखी हुई थीं.ज़रूरी सब्ज़ियां ले लीं.वहां काम करनेवाले सभी यूनीफार्म में थे.कोई न कोई हमपर नज़र रखे रहता था.मुझे बुरा लगा.मधु से कहा,"अरे,हम क्या चोर उचक्के हैं?ये हमें इस तरह क्यों देखते हैं?"
मधु ने हंसकर कहा,"हम तो नहीं,पर यहां आनेवालों में चोर नहीं होंगे इसकी गारंटी भी तो नहीं ना?कोई छोटी मोटी चीज़ जेब में डालकर चल दिए तो?...पर तुम्हें इससे क्या? जो ज़रूरी है ले लो,फिर घर चलेंगे."
उसकी बातों से मुझे तसल्ली नहीं हुई,अब भी मुझे बुरा लग रहा था.
हम सामान लेकर काउंटर के पास खडे हो गए.चार काउंटर थे और चारों में लंबी लाइनें थीं.हमारी बारी आने में पंद्रह बीस मिनट लगे.काउंटर पर दो जने थे.एक लडकी कंप्यूटर पर बिल बना रही थी और दूसरा चीज़ों को प्लास्टिक की थैलियों में डाल रहा था.पैसे लेते समय मैंने सोचा लडकी हमें देखकर मुस्कुराएगी.पर ऐसा कुछ न हुआ तो मुझे अजीब लगा.हम दोनों थैलियां लेकर बाहर आईं तो मैंने बेटी से कहा,"कम से कम वह लडकी मुस्कुरा तो सकती थी? रोबो की तरह बस काम करती रही!"
"क्या मां तुम भी ना,क्या हम उसके दोस्त या रिश्तेदार हैं जो वह हमें देखकर मुस्कुराती?उनका काम सामान बेचना है और हम खरीदारों के सिवा और कुछ नहीं...बस यह तो व्यापार संबंध है,सिंपल!वह तो ठीक ठाक निभ गया ना?और फिर उसके मुस्कुराने या न मुस्कुराने से हमें क्या फर्क पडता है?"
मैं उन सवालों का जवाब तो नहीं दे सकी.हां उससे हमें कोई फायदा तो नहीं होगा,सच है,पर कोई इस तरह मुस्कुरा दे तो मन खुश हो जाता है.इन्सानों के बीच रह रहे हैं ऐसा अहसास मिलता है जो मन को तसल्ली देता है.एक तरह का भरोसा मिलता है.पर शायद आज की पीढी को यह सब महसूस नहीं होता होगा!
                                                * * *
पिछले तीन हफ्तों से फुड वर्ल्ड से ही सामान खरीद रहे थे.सात आठ बार वहां गए होंगे और हर बार मैं यही उम्मीद लेकर जाती कि कम से कम एक तो ऐसा होगा जो हमें देखकर मुस्कुराएगा. ग्राहक की तरह नहीं,इन्सान की तरह हमारे साथ पेश आएगा.ऐसा लगता है कि यहां इन्सान नहीं मशीनें काम कर रही हैं.सब कुछ बडे ही व्यवस्थित रूप से हो जाता है पर उसमें इन्सानियत का स्पर्श नहीं मिलता.एक तरह का शून्य...उदासी मेरे मन को घेर लेती.
रामुलम्मा,कनकय्या,और मस्तानम्मा बार बार याद आने लगे.तीन हफ्ते हो गए बडी मंडी गए.वे समझ रहे होंगे कि मैं फिर बीमार पड गई.हां,यह भी तो एक बीमारी ही है ना?सूपर मार्केट की बीमारी.पिछले तीन हफ्तों से इस सूपर सिंड्रोम से तो पीडित हूं!अब और सहा नहीं जाता.इसका इलाज तो करना ही पडेगा.
अगले वीरवार को कपडे से बनी थैली लेकर घर से निकलने लगी तो बेटी ने पूछा,"कहां जा रही हो मां?"
"बडी मंडी,सब्ज़ी खरीदने."
"क्यों फुड वर्ल्ड से ले रहे हैं ना? तुमने यह भी कहा कि सब्ज़ियां ताज़ी और अच्छी हैं?"
"मैं इन्सानों से सब्ज़ियां खरीदना चाहती हूं मधू!"
"बगल में इतना बडा सूपर मर्केट है और तुम इतनी दूर सब्ज़ी खरीदने जाओ तो सब समझेंगे तुम पागल हो!"
"हां मधू,मैं पागल हूं! इन्सानों  के साथ बात करना,उनका हालचाल पूछना,दुःख सुख बांटना,यह सब पागलपन नहीं तो और क्या है?"
मैं चप्पल पहनने लगी तो मधु ने कहा,"जाओ,जाओ,बस कुछ ही महीनों की बात है.यहां भी वालमार्ट आनेवाला है.वह कम्पनी हमारे देश भर में चेन स्टोर खोलेगी तो ये मंडी वंडी सब बंद हो जाएंगे.रिलायन्स फ्रेश की दूकानें भी जगह जगह खुलनेवाली हैं.तब सब्ज़ियां खरीदने इन्हीं दूकानों में जाना पडेगा.खरीदना चाहो तो भी मंडी में नहीं खरीद सकोगी!"
मैं सन्न रह गई.अगर सचमुच ऐसा होगा तो मंडी में सब्ज़ी बेचनेवाले गरीब कहां जाएंगे,क्या करके अपना पेट भरेंगे?उनके आंसू जमते जाएंगे और फिर एक दिन फटकर उनकी ज़िंदगियों को डुबो देंगे!मेरा दिल अभी से डूबने लगा.
मंडी में आटो से उतरते ही परिचित चेहरे मुस्कुराते दिखाई दिए.ये बेचारे नहीं जानते कि इनपर कहर बरपा होने वाली है.इनकी इन्सानियत की,दुःख की परवाह करनेवाला कोई नहीं रह जाएगा.सूपर मार्केट इनका सबकुछ निगल जाएगा.
"आज कुछ परेशान दिख रही हो बहन,क्या बात है?तबीयत तो ठीक है ना?"मस्तानम्मा ने आत्मीयता दिखाते हुए पूछा.मुझे मधु का सवाल याद आया,’ये क्या हमारे रिश्तेदार या दोस्त हैं?’मस्तानम्मा मेरी क्या लगती है? बस इन्सानियत का ही तो रिश्ता है!
"हाथी जब चलता है तो उसकी चाल सबको मोह लेती है,पर कोई उन चींटियों के बारे में नहीं सोचता जो उसके पैरों के नीचे कुचलकर मर जाते हैं!"मेरा जवाब सुनकर मस्तानम्मा अचकचा गई.मेरी ओर अजीब नज़रों से देखते हुए बोली,"हम ठहरे अनपढ,तुम्हारी बातें हम क्या समझ सकेंगे?"फिर अपनी खूबसूरत हंसी बिखेर दी.
मैं सोचने लगी,क्या यह हंसी हमेशा केलिए बरकरार रहेगी?
फिर मैंने ज़रूरत की सब्ज़ियां खरीद लीं.थैली भर गई.सब्ज़ियों के साथ शायद मंडी से उन सबके दुःख,आंसू और तक्लीफें भी थैली में भरकर लाई थी,इस बार थैली हमेशा से ज़्याद भारी लगी.



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(२०१२ अक्तूबर - नवंबर अंक ’कथन’ पत्रिका में प्रकाशित.)


Wednesday, November 14, 2012


अभी बहुत कुछ बदलने को है                                      मूल तेलुगु कहानी :रमणजीवि
                                                                      अनुवाद : आर.शांता सुंदरी
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 अगस्त २०७८
शाम के पांच बजनेवाले थे.
अबीद्स रोड.आठ साल का बच्चा स्केटिंग कर रहा था.एक फर्लांग दूर से आती साइकिलों की आवाज़ सुनकर पीछे मुडकर एक बार देखा और फिर अपने खेल में मगन हो गया.सडक के बीचों बीच दो गाएं और एक भैंस आराम से बैठे जुगाली कर रही थीं.

"मुझे यकीन नहीं होता कि यह अबीद्स है.लगता है संपूर्ण सूर्यग्रहण,या कर्फ्यू लगा है,"साइकिल को खडी करते हुए एक बीस साल की युवती ने कहा.उसका नाम नीता है.सफेद चूडीदार में उसका बदन बहुत ही कमज़ोर दिख रहा था.उस सडक को देखने के बाद वह अपने मां बाप का अता पता न मालूम होने का दुःख भी भूल गई.

इतनी गाडियां कि तिल रखने की भी जगह नहीं रहती थी यहां.हर तरफ धुआं,जलने की बू,दिल दहलानेवाली आवाज़ों से भरी रहती थी वह जगह.पर अब...!

साथ आई नर्स हंस पडी,"तुम चार साल कोमा में रही.अब अचानक देखने से ऐसा लग रहा है.वरना हमें तो इनकी आदत हो गई है."

’किनकी?’नीता ने आंखों में इस सवाल के साथ नर्स को देखा.

मल्टी स्टोरीड बिल्डिंगें,बडी बडी दुकानें सब बंद हो गईं.उनपर धूल जम चुकी थी.ग्लोसाइन बोर्डों का भी यही हाल था.न जाने कबसे उनका जगमगाना बंद हो गया था!दूर की सिर्फ दो दुकानें खुली थीं और साफ सुथरी नज़र आ रही थीं.बाहर तीन साइकिलें खडी थीं.नीता ने अंदाज़ा लगाया कि अंदर कुछ खरीदार होंगे.

"अरे,इन्सान सब कहां चले गए?...सिर्फ गाडियां..."नीता ने हैरान होकर पूछा.यह देखकर नर्स फूली नहीं समा रही थी.जैसे ये सब करतब उसी का हो!

"कुछ और बातें सुनोगी तो तेरे होश उड जाएंगे!अब इस दुनिया में एक भी मोटर गाडी या हवाई जहाज़ नहीं है...जानती हो?सबको तोडफोड दिया गया.स्क्रेप...सफाचट...!"नर्स ने हाथों के इशारा करते हुए कहा.

नीता को चुप देखकर नर्स ने फिर पूछा,"अच्छा यह बताना अब दुनिया में कितनी आबादी है?"

नीता की आंखें मुंद गईं.पर उसने फिर भी जवाब में कुछ भी नहीं कहा.

"सिर्फ छः करोड से कुछ ऊपर.हैदराबाद में बत्तीस हज़ार.केन यू बिलीव?"उसने रंग बदलते नीता के चेहरे की ओर चमकती आंखों से देखते हुए कहा

"ओह...!" कहकर नीता जल्दी से एक दूकान की सीढियों पर जाकर बैठ गई.नर्स ने भी उसके बगल में बैठकर नीता के कंधे पर हाथ डाला.

"जानती हो अब पैसे नाम की चीज़ भी नहीं रही.सबको हर रोज़ तीन घंटे काम करना पडता है.आज अस्पताल में तो कल जूतों की दुकान में....परसों कपडों की दुकान में...फिर खेतों में...अब मज़हब भी खतम हो गए.देश अलग अलग नहीं हैं...सरकारें भी नहीं हैं...सिर्फ लोग हैं...बस...’जिन बातों को समझाने में कुछ रोज़ लग जाते,नर्स उन्हें पलों में बता देने की कोशिश कर रही थी.

नीता को लगा, नर्स मुझे बुद्धू बना रही है,या यह सब एक सपना है.

"चलो वह सब छोडो और यह बताओ कि असल में हुआ क्या था?...प्लीज़!"

"चार साल पहले की बात है.नवंबर की सातवीं तारीख को..."

             *                                               *                                                    *

नवंबर सात तारीख,२०७४

योगी अपने फार्म हाउस के बाहर आराम कुर्सी पर बैठा था.उसकी उम्र चालीस से ऊपर थी.सूती कमीज़ जीन्स पहने छरहरा बदन था उसका.उसकी आंखें खुली तो थीं पर नज़रें कहीं टिकी नहीं थीं.पीछे के बालों को रह रहकर खींचते हुए किसी सोच में डूबा था वह.

फिर उठकर थोडी दूर पर चारे के लिए बेचैन  खरगोशों के पास गया और उनके सामने घास और सब्ज़ी के टुकडों से भरी टोकरी उंडेल दी.उन्हें प्यार से निहारते हुए उनपर हाथ फेरने लगा.थोडी दूर घास चरते हिरनों की ओर और सूखे पेड की डाली पर बैठे चिंपांज़ी की ओर देखता रहा.

अपने अहाते में निर्मित जलाशय के पास जाकर,मगरमच्छों को देखा.उनमें एक डोरी नाम की मादा मगरमच्छ अंडे देने वाली थी.

हाथ जीन्स की जेब में घुसाकर चारों ओर उसने नज़र दौडाई,ऊंची चारदीवारी के बाहर हवा में हल्के से झूमते लंबे पेड थे.उन पेडों पर बैठी चिडियां मीठी आवाज़ में गा रही थीं.शाम का वक्त था.

योगी की आंखों में उन सबसे अल्विदा कहने का भाव था!

एक बार पीछे के बालों को ज़ोर से खींचकर उसने गेट पूरा खोल दिया.अहाते में से सभी जानवरों को बाहर भगा देने के बाद जलाशय का गेट खोला.तेज़ी से हमला करनेवाले मगरमच्छों से खुद को बचाने के लिए उछलकर दूर गया हो और उन्हें भी चालाकी से बाहर भागा दिया.उसके बाद फार्म हाउस में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया.प्यार से पाले सारे जान्वरों को खुले संसार में छोडकर,अंदर ज़मीन पर एक खुफिया दरवाज़ा खोला और नीचे उतर गया.

सेल्लार में एक बडी मशीन थी जो रस्सियों में बंधे हाथी जैसी दिखाई दे रही थी.उस पर बेतरतीबी से फैले थे कुछ तार और पाइप.चौबीसों घंटे बैकप के सहारे काम करनेवाला जायंट कंप्यूटर था वह.

सभी सिस्टम्स में काम चल रहा था.योगि ने एक बार हाथ की घडी की ओर देखा और एक कोने में रखी फ्लास्क से गरमागरम काफी मग में भरकर,रिवाल्विंग चैर पर बैठ गया.मेज़ पर रखी सिस्टम में ’सेवियर’शीर्षक वीडियो फाइल उसने खोला.तुरंत मानिटर के परदे पर योगी प्रकट हुआ.

’गुड मार्निंग फ्रेंड्स!मेरे नाम से न आपको कुछ लेना देना है न मुझे.क्यों कि हमें अलग करने वाली बातों में नाम भी एक है.

"मैं एक पर्यावरणविद हूं ,प्रकृति से प्रेम करता हूं.मतलब,जंगल,समंदर,आकाश,जानवर,आप,मैं, सब मुझे प्यारे हैं.लेकिन इन सबका विनाश करने की दिशा में मानव अग्रसर हो रहा है.इसलिए अब मैं जो कर रहा हूं वह अनिवार्य है,इसे आप समझ लें.

"वैसे मैं जो  करने जा रहा हूं,वह इस धरती पर संख्या को ठीक करने का काम है.यानी, इस भूमि पर कितने कौव्वे हों,शेर हों,इन्सान हों,यह सब पहले से तय है.जब एक प्रजाति के पक्षियों की तादाद बढ जाती है तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं.उनमें जो ज़िम्मेदारी या विवेक है,वह इन्सान में नहीं है.इसीलिए उसकी ज़िंदगी इतने सम्घर्षों से,इतने असंतोष से भर गया है.जानवर बाल्यावस्था में जितने खुश रहते हैं,बडे होने के बाद भी उतना ही खुश रहते हैं.इन्सानों के विषय में यह पूरी तरह भिन्न है.बढना इतना दुर्भाग्य कैसे माना जाने लगा?क्यों ऐसा हो रहा है?

"विरोधों से भरे नियम ही इसका कारण है.जिन लोगों ने नियम बनाए,उन्हीं को उनका उल्लंघन करने में मज़ा आता है,यह उससे भी बडा विषाद है.इसी क्रम में श्रम के प्रतीक रूप में पैसा नामक ज़हरीले पदार्थ की भी सृष्टि करनी पडी.मानव के प्रस्थान में यह एक अत्यंत विनाशकारी कदम रहा.

"पैसा ऐसा भयंकर ज़हर है कि इन्सान के सहज स्वभाव, आनंद,सृजन शक्ति,सबको मटियामेट कर देता है.संसार की ऐसी अधोगति हो गई है कि पैसा न कमानेवाला हरेक क्षण व्यर्थ समझा जाने लगा.यह तकनीकी युग तो उस सोच की पराकाष्ठा है.इन्सानों की संख्या ठीक करने से बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा.

"पर ज़रूरी नहीं कि यह आपरेशन सफल ही हो.क्यों कि सब ज़रूरी जांच मैं नहीं कर पाया.वजह,यह इन्सानों की मौत पर किया जानेवाला प्रयोग है!ज़्यादातर यह मेरी कल्पनाशक्ति पर ही आधारित है.अगर मैं असफल हो जाऊं,तो भी, अगर किसीको लगे कि मेरे विचार सही हैं,तो इस प्रयोग को आगे ले जाएं...इस पृथ्वी को बचाएं...

"क्यों कि जैसे ही यह आपरेशन पूरा हो जाएगा,इस प्रयोगशाला के साथ मैं भी तहसनहस हो जाऊंगा.मैं जिस नये संसार की सृष्टि करनेवाला हूं उसमें मैं भी न रहूं,इसके लिए मैंने खुद को तैयार करने की ज़रूरत समझी थी..."

इतने में दूर रखे मास्टर कंप्यूटर में से अलर्ट आने लगे.योगी उसके पास जाकर कमांड देने लगा.बीच बीच में मग में से काफी भी पीने लगा.

’सेवियर’,ये बडे अक्षर परदे पर प्रकट हुए.
योगी ने ज़ोर से सांस ली और मग मेज़ पर रख दिया.उसने जो वाइरस तैयार की,उसका नाम रखा सेवियर.जिस दिन वह वाइरस बनी,योगी को नहीं मालूम हुआ कि उससे वह खुश हो या दुखी.

सेवियर सेलफोन के तरंगों के साथ कहीं भी जा सकती थी.फोन उठाते ही उधर के आदमी के साथ आधे किलोमीटर के घेरे के अंदर जो भी होगा,सर्वर ब्रेकडाउन होने से,पूरा का पूरा  पलभर में नष्ट हो जाएगा.उसके बाद कुछ ही पलों में वाइरस भी अपनी शक्ति खो देगा ताकि बाकियों का कोई नुकसान न हो.

समूचे संसार से सेलफोन नंबर इकट्ठे करने में उसका पेशा उसके काम आया.संसार के कोने कोने में यह आपरेशन चलाया जाएगा.उपग्रह केंद्रों में,परमाणु केंद्रों में,एंटी बयाटिक्स,गैस बेसिन्स जैसी संस्थाओं में मुख्य कार्यों पर लगे वैज्ञानिकों को,सामाजिक कार्यकर्ताओं को,इस आपरेशन से योगी ने अलग रखा ताकि उनकी मृत्यु न हो.उन वाइरसों को हटाने,बेकार करने और नए समाज का निर्माण करने केलिए उनका जीवित रहना ज़रूरी था.

वैसे योगी ने इस वाइरस को दस साल पहले बनाया था.तब सारा संसार दो देशों में विभक्त होकर तीसरे विश्वयुद्ध की तैयारी में लगा था.संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी जवाब दे दिया था.

हम ना रहें तो कोई बात नहीं,पर दूसरे को मिटाकर ही रहेंगे,यही दुनिया की सोच हो गई.

इस युद्ध से किसी प्रकार जुडे न रहने वाले करोडों लोग विरोध कर बैठे."आप कौन होते हैं युद्ध करनेवाले?अगर इतना ही शौक है तो द्वन्द्व युद्ध करो!’यही सोचकर जब सेना भी बगावत कर बैठी ,तब जाकर चर्बी चढे सांड जैसे नेता लोगों ने घुटने टेक दिए.

युद्ध रुक जाने से योगी भी रुक गया.

पर वह खुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकी.चांद पर कालोनी बनाने की कोशिशें जब ज़ोर पकडने लगीं,तब दोबारा योगी ने सेवियर को याद किया.

इन्सान और कितने ग्रहों में विनाश की सृष्टि करेगा?इस अन्याय को रोकना पडेगा!इसके विकृत प्यास पर चेक लगाना ज़रूरी है.

क्या यह सचमुच आगे बढना ही है?पीछे जब इतनी भूख और दुःख है...इन्सान को देने केलिए गालियां भी नहीं बची!

कई दिन सोचने के बाद उस रोज़ दोपहर को वह एक पक्का निश्चय कर सका.सेवियर का प्रयोग करना ही होगा!

सेवियर मशीन गरम होने लगा.योगी ने उसको छुआ...गर्मी नापी और हाथ की घडी की ओर देखा.दोपहर दो बजे वाइरस प्रक्रिया शुरू हुई.उस पूरी प्रक्रिया को खतम होने में छः घंटे और पैंतीस सेकंड लगेंगे.

योगी रिवाल्विंग कुर्सी पर बैठकर अपना वीडियो देखने लगा.फिर उसने संदेश देना शुरू किया...

"इन्सान अगर चांद पर कालोनियां बनाने लगेगा तो जानते हैं क्या होगा?मैं समाज शास्त्री नहीं हूं जीवशास्त्र का वैज्ञानिक हूं.फिर भी कल्पना कर सकता हूं.होगा यह कि...पैसेवाले सब चांद पर प्रवास कर जाएंगे.वैसे जाएंगे तो कोई बात नहीं,इस धरती को एक खंडहर बनाकर जाएंगे.आगे चलकर यह धरती एक प्रयोगशाला का रूप ले लेगी तो भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.यहां जो लोग रह जाते हैं,उन्हें इन्सान की पहचान भी नहीं मिलेगी.यह दौर वैसे अभी शुरू हो चुका है.

"और एक बात...

अपार जलराशियों से,अनन्य वनों से,अद्भुत वातावरण से शोभायमान इस धरती को नष्टभ्रष्ट करनेवाले केलिए चांद को मिटाने में कितना वक्त लगेगा?सच पूछिए तो जब यह इस धरती को पूर्व रूप देने का काम करेगा तभी दूसरे ग्रहों पर उडकर जाने की योग्यता पा सकेगा.

"यह इस प्रकार अति उत्साह से हत्या और आत्महत्या करने लगेगा तो मैं चुप नहीं रहूंगा.एक पर्यावरणविद होने के नाते..."

इतने में ज़ोर से अलार्म बजी.योगी चौंक उठा.घडी की ओर देखा.सबकुछ समय के मुताबिक हो रहा था,एक सेकंड का भी फर्क नहीं आया.अपने प्रयोग की सफलता के ही आसार दिखाई दे रहे थे उसे.उसका दिल और ज़ोर से धडकने लगा!

उसने वीडियो फाइल बंद किया और वहां से उठा.हेल्मेट जैसी चीज़ पहनकर प्रोसेस्सिंग मशीन के लीवर को लाल बत्ती के जलने तक ऊपर नीचे पंप किया.ऐसा करते वक्त उसके हाथों में हल्का सा सिहरन उठ रहा था.उसने सोचा, मेरे हाथ की एक एक हरकत मनुष्य की नस्ल को मौत की तरफ एक एक कदम ले जाएगी!

लाल बत्ती जल उठी!प्रयोगशाला में लाल रोशनी भर गई.योगी को लगा कि वह रोशनी ज़बर्दस्ती अंदर घुस आनेवाली शाम की निस्तेज रोशनी जैसी है.

’सेवियर रेडी’,ये अक्षर जलते बुझते दिखाई देने लगे.’लोड काल्स’,टाइप करके कुर्सी पर वह आराम से बैठ गया और आंखें मूंद लीं.अपने मन को काबू में करने का वह भरसक कोशिश कर रहा था, फिर भी वह उद्वेलित होने लगा.

सिस्टम में जो बाक्स था, उसमें लाल रंग भरने लगा.यानी, लाखों फोन नंबर डायलिंग के लिए तैयार होने लगे हैं.उनमें योगी,उसकी पत्नी और बेटे के नंबर भी हैं.अगर कोई फोन नहीं उठाए या फोन एंगेज रहे तो नंबर एक घंटे तक रीडायल होते रहेंगे.

"रेडी टु काल!"एक मोटी आवाज़ मानिटर में से आई और योगी ने चौंककर आंखें खोल दीं.मानिटर पर लाल अक्षरों में’काल’लिखा था.

एंटर दबाने से सैकडों करोडों इन्सान कुछ ही पलों में इस दुनिया से उठ जाएंगे.यानी कई शरीरों में मनुष्य जीना छोड देगा.बस! मनुष्य रहेगा...प्राचीन मनुष्य!मैं सिर्फ उसे एडिट कर रहा हूं! योगी बुदबुदाया.

एंटर बटन पर उसकी पतली उंगली गई.अंगूठा कांप रहा था.उसके मन में आखिरी बार बिना चेहरेवाले करोडों इन्सान दिखाई दिए...बस एक पल के लिए!

लंबी सांस भरकर उसने ज़ोर से एंटर का बटन दबाया.

अगले पल मेज़ पर रखा सेलफोन बज उठा.योगी ने उसे उठाया.रिसीविंग बटन दबाते हुए वह बेचैन और परेशान हो गया.अपना प्रयोग सफल होगा या नहीं इस बात की चिंता थी उसे...एक कलाकार की बेचैनी...उसने हेलो कहा...

हाइ वोल्टेज बिजली का झटका लगने से जैसे कांप जाते हैं,वैसे ही योगी का समस्त शरीर कांप उठा.उस स्थिति में भी अपने प्रयोग की कामयाबी से योगी के होंठों पर खुशी खिल गई...बस आधे पल के लिए...तुरंत वह कुर्सी से उछलकर नीचे अचेत होकर गिर पडा.

एक घंटे बाद वह प्रयोगशाला धमाके के साथ फट पडी.इस तरह  दुनिया को बचाने केलिए दुनिया छोड गया नोबेल पुरस्कार को अस्वीकार करनेवाला प्रसिद्ध पर्यावरणविद,योगी!

"वह जो भी था,मगर सच्चा प्रेमी था...इस दुनिया से उसे सच्चा प्यार था."ज़मीन की ओर देखते हुए कहा नीता ने.फिर ऊपर आसमान को देखकर सोचा,’नए अक्षर उडने को हैं!’

नर्स ने एक साइकिल वहीं छोड दी और नीता को अपनी साइकिल के बार पर बिठा लिया.नीता बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी."चलो तुम्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाती हूं!"नर्स साइकिल चलाते हुए बोली.नीता चारों ओर नज़र दौडाकर गौर से देखने लगी...कहीं कोई इन्सान नहीं दिखाई दे रहा था...बस कुछ कुत्ते और गाएं थीं.

एक बडे किले के आगे नर्स ने साइकिल रोकी.उस किले की दीवार का ओर छोर नहीं था,दिगंतों तक दीवार चली जा रही थी.

"यह हमारी कालोनी का बार्डर है," नर्स ने कहा.दोनों दीवार के पास जाकर उसमें लगी जालीदार खिडकी से अंदर झांका.दीवार के उस पार एक खंदक था.उसके आगे टूटे फूटे मकानों के बीच एक जंगल शुरू हो रहा था.शेर और हिरन एक ही खंदक से पानी पी रहे थे.

नीता ने हैरान होकर नर्स की ओर देखा.

"लगता है उस शेर ने अभी अभी पेट भरके खा लिया,बस! हिरन जानते हैं कि कब उन्हें शेर से खतरा है.शेर ज़्यादातर हिरन जैसा ही होता है.सिर्फ इन्सान है जो चौबीसों घंटे शेर बना रहता है!"

नीता ने नर्स की बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.

"क्या यह चिडिया घर है?"नीता ने पूछा.नर्स नीता के बाल बिखेरते हुए हंसी और बोली,"नहीं बच्चे...यह जंगल है.हमारी कालोनी के चारों ओर का जंगल.सिर्फ इस तरफ की दीवार के यह इतने पास है.बाकी तीनों तरफ से जाना हो तो सैकडों किलोमीटर फार्म हाउज़ेस को पार करने के बाद ही जंगल तक पहुंचा जा सकता है.जानवरों को देखने केलिए इस तरफ इस दीवार को यहां खडा किया है.इस खंदक को खोदने में और दीवार बनाने में मेरा भी पसीना मिला हुआ है,जानती हो?बीस हज़ार लोगों ने काम किया तो एक साल में इसे बना पाए!"

नीता शेर और हिरनों को देखने लगी.

"अब इन्सान और जानवर अपनी ज़िंदगी अलग अलग रहकर जीते हैं .एक दूसरे के मामले में टांग नहीं अडा सकते.प्राकृतिक चुनाव को इन्सान नें ही खराब करके रख दिया था.फिर एक इन्सान ने ही...सिर्फ एक इन्सान ने...उसे ठीक कर दिया!"

"तो क्या संसार में हर जगह ऐसी ही कालोनियां हैं?"

"पता नहीं,योगी ने जो वीडियो में बताया ,उसके आधार पर सब यही मानते हैं,पर इन कालोनियों में किसी का किसीसे भी संबंध नहीं हैं.योगी के प्रयोग की वजह से सारे सेल टावर खराब हो गए.शायद योगी खुद नहीं जानता था इस तरह कुछ होगा.टीवी चेनेल काम नहीं करते.शायद सेटिलाइट्स को इनेक्टिव कर दिया हो?असल में कोई भी इस तरह का संबंध रखना ही नहीं चाहता.संबंध रखना हो तो जंगलों और समंदरों में रास्ते बनाने होंगे.मतलब,उन्हें चोट पहुंचाना होगा."

"जंगलों,रेगिस्तानों और समंदरों को अबतक जो पार करते रहे वह काफी है.अब वे सब हमें रोमांच नहीं पहुंचाते.किसी को ये काम करने की रुचि या ज़रूरत नहीं रही.यह जो ज़िंदगी हम जी रहे हैं,वही अच्छी है,है ना?"रिवाल्विंग कुर्सी पर गोल गोल घूमते हुए नर्स ने कहा.

नीता को नर्स की बत ठीक लगी और वे शब्द उसके मन में बहुत देर तक गूंजते रहे.

नर्स ने उठकर डीवीडी चालू किया.टीवी के परदे पर योगी प्रकट हुआ.दाढी करीने से ट्रिम किए था वह.उसकी आंखों में चमक के साथ हल्की सी नमी भी दिखाई दी.उसके चेहरे पर प्यार का भाव था.उसकी आवाज़ साफ थी और कानों को भली लग रही थी.सुननेवाले को एक दम आकर्षित कर लेनेवाला व्यक्तित्व था उसका.

..."अब आप जिस ज़मीन पर चल फिर रहे हैं.इसका एक एक इंच कई लोगों के खाली करके चले जाने से ही आपको मिला है.यह आप अच्छी तरह याद रख लें..."

योगी का भाषण चल ही रहा था,इतने में नर्स ने गलती से रिमोट का बटन दबा दिया.परदे पर से योगी गायब हो गया और लोकल फिज़िकल कनेक्टिविटी से काम करनेवाला दूसरा चेनल चल पडा.

उसमें खबरें पढी जा रही थीं...

’इस नई दुनिया में सबसे पहला अपराध...अपने प्रेम को ठुकरानेवाली चौदह साल की लडकी का गला ब्लेड से काटनेवाला युवक...’

नीता ने लंबी सांस छोडकर सोचा...अभी इस दुनिया में बहुत कुछ बदलने की ज़रूरत है!

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